एरीज में दस करोड़ रुपये के उपकरणों और छह करोड़ की राशि से नवनिर्मित प्रयोगशाला में यह रडार स्थापित किया गया है। रडार क्षैतिज और लंबवत दोनों दिशाओं में 18 किमी दूरी तक वायुमंडल का अध्ययन करने में सक्षम है।
इसके जरिये किए गए विश्लेषण में यह भी जानकारी मिली कि पश्चिमी विक्षोभ के साथ ही ओजोन की परत में भी अंतर देखने को मिलता है और यह कुछ नीचे को खिसक जाती है। ओजोन परत संरक्षण के लिए यह बहुत अहम जानकारी है।
एसटी रडार से डाटा संग्रहण और विश्लेषण कर रहे वैज्ञानिक डॉ. मनीष नाजा ने बताया कि इस रडार से पहली बार हवा के दबाव में बदलाव के साथ ही उस हवा के स्रोत का भी अध्ययन संभव हो पाया और पता लगा कि प्रदूषित हवा यूरोप और अफ्रीका से आईं थीं। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने सेंसर लगे गुब्बारे भी छोड़े जिन्होंने 18 किमी की ऊंचाई तक जाकर सफलतापूर्वक आंकड़े भेजे।
डॉ. मनीष ने बताया कि वायुमंडल के अध्ययन के लिए विश्व में 50 और 400 मेगा हर्ट्ज के रडार प्रचलित हैं। 50 मेगा हर्ट्ज के रडार से 30-40 किमी जबकि 50 मेगा हर्ट्ज से आठ किमी तक के वायुमंडल का अध्ययन किया जाता है। 18-20 किमी रेंज के स्पष्ट आंकड़े इन दोनों से ही नहीं मिल पाते। यहां स्थापित 206.5 मेगा हर्ट्ज रडार से इस रेंज के बेहतरीन आंकड़े मिले हैं जिनसे ये नई खोज संभव हो सकी। इस टीम में एरीज के निदेशक डॉ. वहाबुद्दीन, इंजीनयर समरेश भट्टाचार्जी और डॉ. मनीष शामिल हैं।
एरीज में स्थापित एसटी रडार पूरी तरह स्वदेशी है। इसका निर्माण हैदराबाद की कंपनी ईसीआइएल ने किया है। 206.5 मेगा हर्ट्ज फ्रीक्वेंसी का रडार अब तक देश और विश्व में न होने के कारण इसके लिए इसरो से विशेष स्वीकृति मांगी गई थी।
इसरो की स्वीकृति के बाद ही इसकी स्थापना हो पाई। डॉ. मनीष नाजा ने बताया कि यह प्रोजेक्ट 2008 में शुरू हुआ था और विशाल प्रयोगशाला के निर्माण और उपकरणों की स्थापना विभिन्न चरणों में की गई। यह प्रोजेक्ट अब पूरा हुआ है और रडार क्रियाशील हुआ है। उन्होंने बताया कि तिरुपति और कोचीन में पूर्व से ही रडार कार्यरत हैं, जबकि 206.5 मेगा हर्ट्ज पर कार्य करने वाला यह विश्व का पहला रडार है।