बीती 16-17 जून की आपदा के बाद सरकार की समझ में आया था कि पर्वतीय जिलों में तुरंत राहत बांटना कितना चुनौती भरा काम है।
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अब 2014 की चुनावी बेला में राजनीतिक दलों को एक बार फिर यह परीक्षा देनी होगी।
खराब सड़क संपर्क, हर चार कदम पर दगा दे जाता मोबाइल नेटवर्क और जब तब बिगड़ जाता मौसम प्रत्याशियों के धैर्य की परीक्षा भी लेगा और मतदाताओं से दूरी बनाए रखने का काम भी करेगा।
इसके उलट, मैदानी क्षेत्रों में प्रत्याशी चेतक पर सवार होंगे। एक ही दिन में 10-10 जनसभाएं करने की योजना पर अमल करेंगे और देर रात तक भी चुनावी रणनीति में उलझे रह सकेंगे।
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पर्वतीय जिलों से मिलकर बनी हैं तीन संसदीय सीटें
उत्तराखंड के करीब साढ़े नौ जिले पर्वतीय क्षेत्रों में हैं। इस हिसाब से करीब तीन संसदीय सीटें हैं जो पर्वतीय जिलों से मिलकर बनी हैं।
नैनीताल संसदीय सीट में नैनीताल का कुछ हिस्सा पहाड़ी है। इसी तरह टिहरी सीट का देहरादून का कुछ हिस्सा मैदानी है। वर्ष 2010-11 की खासी बरसात के कारण प्रदेश के पर्वतीय जिलों में करीब 14 हजार किलोमीटर सड़कों को नुकसान हुआ था।
इसका असर 2012 के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था। हाल यह था कि कई क्षेत्र ऐसे थे जहां प्रत्याशी पहुंच ही नहीं पाए।
हालांकि मतदाताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। सबसे दुरूह माने जाते उत्तरकाशी में मत प्रतिशत करीब 70 प्रतिशत रहा था। पर प्रत्याशियों को यह मलाल रह ही गया कि क्षेत्र में पहुंचकर भी मतदाताओं से सीधी बात नहीं कर पाए।
टिहरी में करीब 13 लाख मतदाता
2014 के लोकसभा चुनाव में भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। टिहरी संसदीय सीट का क्षेत्रफल करीब 15 हजार वर्ग किलोमीटर है और यहां मतदाता करीब 13 लाख हैं।
जाहिर है कि करीब 13 लाख मतदाताओं की नब्ज टटोलने के लिए खासी मशक्कत प्रत्याशियों को करनी होगी। इसके उलट हरिद्वार से तुलना करें। कुल दो हजार वर्ग किलोमीटर और मतदाता 15.5 लाख।
जाहिर है कि कम समय में अधिक से अधिक लोगों से मिलने में कोई परेशानी नहीं होगी। दूसरी ओर मैदानी क्षेत्रों में सड़कों का जाल है और यातायात भी सुलभ।
परेशानी का एक बड़ा कारण पर्वतीय जिलों में अलग-थलग बिखरी जनसंख्या भी है। पहाड़ में पांच हजार से ज्यादा आबादी वाले कस्बे और गांव अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। ऊपर से पहाड़ की सड़कों का हाल बुरा है।
पर्वतीय जिलों में बरसात ने मचाई थी तबाही
बीती 16-17 जून को सिर्फ केदारघाटी में ही नहीं बल्कि अधिकतर पर्वतीय जिलों में बरसात ने तबाही मचाई थी। करीब 4000 किलोमीटर सड़कों और 150 पुलों को नुकसान पहुंचा था।
ऐसे में सड़क मार्ग से चुनाव प्रचार करना समय के हिसाब से भी बेहद खर्चीला होगा। टिहरी, पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा जैसी संसदीय सीटों की दुरूहता का एक अंदाजा पोलिंग बूथों की स्थिति से भी लगाया जा सकता है।
प्रदेश में करीब 1700 बूथ ऐसे हैं जहां पर मतदान पार्टियों को करीब तीन से लेकर 20 किलोमीटर तक की दूरी पैदल नापनी होती है। 20 किमी से अधिक की पैदल दूरी वाले पोलिंग बूथ उत्तरकाशी और चमोली जिले में हैं।
मतलब कि टिहरी संसदीय सीट और पौड़ी संसदीय सीट के प्रत्याशियों के सामने यह अलग से एक चुनौती होगी कि दूरदराज क्षेत्रों तक समय रहते पहुंच पाएं।
मौसम की मेहरबानी की भी जरूरत
चुनौती सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। मौसम की मेहरबानी की भी जरूरत इन प्रत्याशियों को होगी।
मार्च और अप्रैल का महीना यूं तो ज्यादा बरसात वाला नहीं है, पर मौसम में गड़बड़ी ने सारे अनुमान ध्वस्त किए हुए हैं। ऐसे में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना खासा कठिन साबित हो सकता है।
2012 के विस चुनाव में ऊंचाई वाले इलाकों की ओर कई प्रत्याशी इसीलिए रुख नहीं कर पाए कि कहीं वे बर्फ में ही कैद होकर न रह जाएं। इस बार बर्फ का सामना तो इन्हें नहीं करना होगा पर मौसम साफ रहने की दुआ तो रोज करनी ही पड़ सकती है।
क्या पता, कहां पर रोड ब्लॉक हो जाए और सारा प्रचार एक ही ब्लॉक तक सीमित होकर रह जाए। गनीमत यह है कि इस बार चुनाव प्रचार के लिए पार्टियों के पास दो माह तक का वक्त है।
2009 में कांग्रेस ने ऐन वक्त पर प्रत्याशी घोषित करने का नुकसान भी उठाया था। इस बार भी प्रमुख पार्टियों ने अब तक प्रत्याशियों को मैदान में नहीं उतारा है।
लिहाजा उम्मीदवार घोषित होने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि आखिरकार चुनाव प्रचार के लिए समय कितना मिल पा रहा है।