उत्तराखंड राज्य गठन का पहला अधिकारिक दस्तावेज यूपी सरकार को सौंपने वाले वरिष्ठ सपा नेता विनोद बड़थ्वाल के निधन से उत्तराखंड और यूपी को जोड़ने वाला ‘सेतु’ टूट गया। यूपी सरकार ने उत्तराखंड के साथ परिसंपत्तियों के बंटवारे की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी। बड़थ्वाल के निधन से उत्तराखंड और यूपी के बीच संयुक्त विकास योजनाओं के खाके को झटका लगा है। बड़थ्वाल प्रदेश में सपा का इकलौता उत्तराखंडी चेहरा रहे हैं। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ वे पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं।
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सपा के गठन का निर्णय वर्ष 1992 में राजपुर रोड, देहरादून स्थित रामकृष्ण मिशन में लिया गया। इस निर्णय में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ रामशरण दास और विनोद बड़थ्वाल साथ थे। 1989 में जब जनता दल की सरकार में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो 1990 में उन्होंने बड़थ्वाल को यूपी निर्यात निगम का चेयरमैन बनाया था।
इसके बाद 1993 में यह प्रस्ताव पास हुआ था कि अगर सपा की सरकार बनी तो उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा दिया जाएगा। 1994 में सपा की सरकार बनने पर विनोद बड़थ्वाल की अध्यक्षता में राज्य निर्माण समिति बनाई गई। जून 1994 में बड़थ्वाल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। उत्तराखंड को राज्य बनाए जाने के संबंध में यह पहला अधिकारिक दस्तावेज बना।
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अगस्त 1994 को यूपी विधानसभा और विधान परिषद ने उत्तराखंड को राज्य बनाने का संकल्प पारित कर दिया। वर्ष 1996 में आरक्षण आंदोलन राज्य आंदोलन में तब्दील हुआ। लेकिन रामपुर तिराहा कांड से सपा के खिलाफ माहौल बन गया। यह वही वक्त था कि बहुत से नेताओं ने सपा का दामन छोड़ दिया। उस वक्त भी हर तरफ से आलोचनाओं के बावजूद बड़थ्वाल सपा में ही रहे। अखिलेश सरकार ने उन्हें सलाहकार बनाकर परिसंपत्तियों के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपी। उनके मार्फत ही पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और यूपी के कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के बीच बैठक हुई। इसमें संयुक्त विकास कार्यों का खाका बना था।
विनोद बड़थ्वाल के राजनीतिक सफर पर एक नजर
विनोद बड़थ्वाल को आखिरी विदाई
- फोटो : AmarUjala
- वर्ष 1980 में विनोद बड़थ्वाल हेमवती नंदन बहुगुणा के नजदीक आए
- इसी साल लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी में शामिल हुए
- वर्ष 1980 में डीएवी के महामंत्री और वर्ष 1982 में अध्यक्ष बने
- वर्ष 1985 में दलित, मजदूर, किसान पार्टी के टिकट पर मसूरी विधानसभा से चुनाव लड़े
- वर्ष 1989 में बहुगुणा के निधन के बाद उनका परिवार कांग्रेस में शामिल हो गया, लेकिन बड़थ्वाल ने लोकदल (बी) को पहाड़ पर जिंदा रखा
- वर्ष 1989 में लोकदल (बी) का मुलायम सिंह की अगुवाई में जनता दल में विलय हो गया। विनोद बड़थ्वाल जनता दल के प्रदेश सचिव बने।
- वर्ष 1991 में वह मुलायम सिंह के साथ चंद्रशेखर की पार्टी सजपा में शामिल हुए
- वर्ष 1992 में सपा के गठन के बाद बड़थ्वाल को पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया
- वर्ष 1993 में सपा की सरकार बनने पर सपा मुखिया ने उन्हें उत्तराखंड को राज्य बनाने के संबंध में जनजागरण अभियान के लिए क्रांति रथ सौंपा
- बड़थ्वाल दो बार सपा के राष्ट्रीय महासचिव और दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहे
- अगस्त 2015 को उन्हें अखिलेश सरकार का सलाहकार (राज्यमंत्री दर्जा) बनाया गया
मेरी उनसे 35 साल की मित्रता रही है। सपा में उनके साथ रहे और राजनीतिक मतभेद भी रहे, लेकिन मतभेद निजी संबंधों में कभी आड़े नहीं आए। सभी दलों के नेताओं से उनके निकट संबंध रहे हैं। प्रदेश हित में वह मशविरा भी देते रहे। वह हेमवती नंदन बहुगुणा और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के प्रति जीवन पर्यंत निष्ठावान रहे हैं। वह आलोचना भी इस अंदाज में करते थे कि बुरा नहीं लगता था। उनका जाना अपूर्णनीय क्षति है।
-मुन्ना सिंह चौहान, प्रदेश प्रवक्ता भाजपा
कभी लीक से नहीं हटे: धस्माना
विनोद बड़थ्वाल ऐसे समाजवादी नेता थे, जो एक दिन के लिए भी अपनी लीक से नहीं हटे। उनका मेरा 20 साल का साथ रहा है। हम लोग 1980 से वर्ष 2000 तक साथ रहे हैं। सपा की बुनियाद डालने वालों में वह सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ रहे हैं। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का पहला सरकारी दस्तावेज बड़थ्वाल कमेटी की रिपोर्ट है।
-सूर्यकांत धस्माना, वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रदेश कांग्रेस कमेटी उत्तराखंड
वह चाहे छात्र नेता के रूप में रहे हों या फिर राजनेता के रूप में अपनी छवि कभी धूमिल नहीं होने दी। वह वैचारिक स्तर पर राजनीति करते थे। सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को कभी सिद्धांतों के आड़े नहीं आने दिया। राजनीतिक जीवन में वह समाजवादी विचारधारा की लीक से कभी नहीं हटे। उनकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो पाएगी।
-डॉ. एसएन सचान, प्रदेश अध्यक्ष सपा