आरोप है कि कुछ उम्मीदवारों को बगैर प्रवेश प्रक्रिया के पीएचडी के लिए पंजीकृत किया गया और डेढ़ साल में ही उन्हें उपाधि दे दी गई। इसके अलावा वर्ष 2009 और 2010 में उन लोगों को उपाधि दी गई, जिनका विभिन्न विश्वविद्यालयों से यहां ट्रांसफर हुआ था।
वर्ष 2010 में वाइवा और 2011 में पंजीकरण का भी आरोप लगा था। वर्ष 2017 में पीएचडी प्रवेश परीक्षा में भी गड़बड़ी का आरोप लगा था, लेकिन इस मामले में अब तक किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है।
विवि प्रशासन पर पीएचडी घोटाले के अलावा नियुक्ति में मानकों की अनदेखी, अफसरों के परिवारीजनों व रिश्तेदारों को नियुक्ति और कुछ खरीद टेंडरों में गड़बड़ी के आरोप लगते रहे हैं।
पूर्व राज्यपाल डॉ.कृष्णकांत पाल ने वर्ष 2016 में वित्तीय गड़बड़ियों और नियुक्तियों में गड़बड़ी को लेकर तत्कालीन मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह से जांच करवाई थी, इसके बाद राजभवन के निर्देश पर वर्ष 2019 में भी विभागीय जांच हुई।
यूटीयू के पूर्व कुलपतियों के कार्यकाल की विजिलेंस जांच के आदेश दे दिए गए हैं। विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर आरोप लगे हैं, जिनकी गंभीरता को देखते हुए सरकार ने यह निर्णय लिया है।
- ओम प्रकाश, अपर मुख्य सचिव, तकनीकी शिक्षा