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सुंदरलाल बहुगुणा : ग्लेशियर पिघलते देख लिया था संकल्प, जल संरक्षण के लिए चावलों का आजीवन किया त्याग

Sat, 22 May 2021 04:22 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनोद चमोली, अमर उजाला, चंबा (टिहरी)

सार

उन्होंने गोमुख से नीचे की ओर फैलते हुए रेगिस्तान को पहली बार देखा तो भागीरथी में गोता लगाने के बाद तत्काल हिमालय और जल संरक्षण का संकल्प लिया।
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प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा - फोटो : https://www.facebook.com/anuradha.sarang
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विस्तार
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हिमालय के ग्लेशियरों की सेहत जानने के लिए प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा 1978 में गोमुख की यात्रा पर गए। इस दौरान गोमुख में ग्लेशियरों को पीछे हटते देखा, तो हैरान हो गए। फिर क्या था, उन्होंने तत्काल भागीरथी में गोता लगाकर हिमालय और जल संरक्षण का संकल्प ले लिया। इतना ही नहीं, भविष्य में जल संकट के खतरों को भांपते हुए चावलों का भी त्याग कर दिया। तब से लेकर बहुगुणा ने जीवन में कभी भोजन में चावलों को नहीं लिया।

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जब उन्होंने गोमुख से नीचे की ओर फैलते हुए रेगिस्तान को पहली बार देखा तो भागीरथी में गोता लगाने के बाद तत्काल हिमालय और जल संरक्षण का संकल्प लिया। उनका कहना था कि प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण ग्लेशियर पीछे हटते जा रहे हैं, जिस कारण भविष्य में जल संकट को देखते हुए उन्होंने अपने भोजन में चावलों का त्याग कर दिया। दरअसल, चावल की खेती में पानी की ज्यादा जरूरत होती है।
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उनका मानना था कि पानी को बचाने के लिए खान-पान की जीवन शैली में बदलाव करना ही होगा। इसकी शुरुआत सुंदरलाल बहुगुणा ने अपने भोजन से चावलों के त्याग से की। उनका मानना था कि अगर जल ही जीवन है तो उस जीवन को बचाने के लिए हम क्या कर रहे हैं? मनुष्य के सामने आ रहे संकटों के लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार है और इसका समाधान भी मनुष्य ही कर सकता है।

बहुगुणा इस बात पर हमेशा जोर देते थे कि जल संकट को लेकर हम चाहें कितने जुमले बोलें, लेकिन सच्चाई यह है कि हम इसके इस्तेमाल को लेकर कतई संवेदनशील नहीं हैं।

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टिहरी बांध मामले में हाईकोर्ट में खुद रखा था बहुगुणा ने ग्रामीणों का पक्ष

पहाड़ के पर्यावरण के प्रति सुंदरलाल बहुगुणा की जागरूकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि टिहरी बांध के मामले में उन्होंने स्वयं हाईकोर्ट में ग्रामीणों के पक्ष को प्रभावशाली तरीके से रखा था। क्षेत्र के ग्रामीण शुरू से ही टिहरी बांध का विरोध कर रहे थे। तत्कालीन सरकारों ने जब ग्रामीणों की नहीं सुनीं तो इस मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। यह वह समय था जब उतराखंड राज्य अलग अस्तित्व में आया था।

बताया जाता है कि वर्ष 2004 में टिहरी बांध को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका की सुनवाई होनी थी। याचिका की सुनवाई न्यायाधीश न्यायमूर्ति अशोक ए देसाई की खंडपीठ में होनी थी। तब बहुगुणा स्वयं हाईकोर्ट पहुंचे थे। उन्होंने न्यायालय से बांध निर्माण को लेकर ग्रामीणों का पक्ष स्वयं रखने की अनुमति मांगी थी।

न्यायालय से अनुमति मिलने के बाद बहुगुणा ने बांध निर्माण से होने वाली दुश्वारियों के साथ-साथ विस्थापन से जुड़े मामलों में पुरजोर तरीके से अंग्रेजी में ग्रामीणों का पक्ष रखा। उनके इस अंदाज को देख मौके पर मौजूद अधिवक्ता भी दंग रह गए थे।

स्वतंत्रता सेनानी कंसल से थी बहुगुणा की घनिष्ठता
चिपको आंदोलन के जनक सुंदरलाल बहुगुणा की नैनीताल निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बांके लाल कंसल से खासी घनिष्ठता थी। वह जब भी नैनीताल आते कंसल के घर जरूर जाते। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कंसल के पुत्र सुबोध कंसल बताते हैं कि बहुगुणा जब भी नैनीताल आते तो बाबूजी के साथ पर्यावरण से लेकर तमाम ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करते थे।

यही नहीं., वह वनों के साथ-साथ झीलों और नदियों को भी बचाने पर जोर देते थे। कहते थे कि जल, जंगल व जमीन ही हमारी थाती है। इसे बचाने के लिए सभी को आगे आना चाहिए। उन्होंने बताया कि बहुगुणा पहली बार वर्ष 1947 में उनके घर आए थे।

टीम भावना से समाज हित में काम करते थे बहुगुणा : राधा बहन
प्रसिद्ध समाजसेवी और जमुना लाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित राधा बहन ने कहा कि बहुगुणा ने पूरा जीवन समाज के लिए संघर्ष करने में अर्पित कर दिया। पर्यावरण आंदोलन के प्रणेता बहुगणा जैसे व्यक्ति कम हैं। स्व. बहुगुणा के साथ चिपको आंदोलन, टिहरी बांध विरोधी आंदोलन में राधा बहन भाग ले चुकी हैं। राधा बहन ने बहुगुणा के साथ दशकों तक जनांदोलनों में कंधे से कंधे मिलाकर काम किया।

वह बताती हैं कि बहुगुणा टीम भावना से समाज हित में काम करते थे। बहुगुणा ने आजादी आंदोलन में भाग लिया और श्रीदेव सुमन के साथ भी काम किया। खादी ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने के साथ ही ग्राम स्वराज की स्थापना करने के लिए बहुगुणा जीवन भर संघर्षरत रहे और महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

राधा बहन कहती हैं कि बहुगुणा मार्गदर्शन और भाषण देने तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि आम जन के साथ धरातल पर काम किया करते थे। उनकी विशेषता थी कि वह टीम भावना को महत्व देते थे। 
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