बहुगुणा पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों के साथ-साथ सर्वोदय और भूदान जैसे आंदोलनों से भी जुड़े रहे। इन तमाम आंदोलनों के तहत की गई पदयात्राओं ने बहुगुणा के मन में पहाड़ के ज्वलंत मुद्दों को हवा दी। अनुसूचित जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने से लेकर शराबबंदी को लेकर किए गए आंदोलनों में भी बहुगुणा की अहम भूमिका रही।
वर्ष 1970 में अलकनंदा नदी में आई बाढ़ की विभीषिका के बाद ही बहुगुणा ने चमोली से चिपको आंदोलन की शुरुआत की। आपातकाल के दौरान कुछ समय के लिए चिपको आंदोलन ठहर गया। यह वह समय था जब कुछ आंदोलनकारी जेपी के पक्ष में तो कुछ विनोवा भावे के पक्ष में खड़े नजर आए। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उम्मीद जगी कि सरकार चिपको आंदोलन की मांगों पर गौर करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके खिलाफ जगह-जगह हुए आंदोलनों ने चिपको आंदोलन को और अधिक हवा दे दी।
पाठक बताते हैं कि उसके बाद जब इंदिरा गांधी की सरकार आई तो उसने चिपको आंदोलनकारियों की कई मांगें मान लीं। उन्होंने बताया कि उसके बाद भी बहुगुणा चुप नहीं बैठे। उन्होंने हिमालयी राज्यों की समस्याओं के समाधान को लेकर कश्मीर से देशभर की यात्रा की। पाठक ने कहा कि ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो अपने जीवन के लगभग 80 साल समाज के लिए होम कर दें। सुंदरलाल बहुगुणा ने पहाड़ और पहाड़ी राज्यों के लिए जो कुछ किया वह हमेशा याद रखा जाएगा।
वर्ष 2010 में आखिरी बार नैनीताल आए थे बहुगुणा
पदमश्री शेखर पाठक बताते हैं कि सुंदरलाल बहुगुणा दसियों बार नैनीताल आए। समय-समय पर उन्होंने यहां कई कार्यक्रमों और कार्यशालाओं में पर्यावरण से संबंधित व्याख्यान दिए। आखिरी बार वह वर्ष 2010 में कुमाऊं विवि के कार्यक्रम में आए थे, लेकिन तब उनसे भेंट नहीं हुई थी।