महामना मालवीय की अगुवाई में दो वर्षों तक लड़ी गई लड़ाई सफल हुई थी। अंग्रेजों को हरकी पैड़ी तक गंगा की अविच्छिन्न धारा जस की तस छोड़नी पड़ी और लिखित समझौता भी पुरोहितों के साथ करना पड़ा।
1915 में होने वाले कुंभ पर गंगा को नियंत्रित करने के लिए गवर्नर सर जेम्स मेस्टन के नेतृत्व में गंगा पर बांध बनाने की योजना 1914 में शुरू हुई। पुरोहितों ने आपत्ति जताई कि बंधी हुई गंगा में कुंभ स्नान नहीं हो सकता। पुरोहित काशी जाकर महामना को बुला लाए और अपना नेतृत्व उन्हें सौंप दिया।
विरोध इतना प्रबल हुआ कि पंडों ने अपने राजा यजमानों से सहायता मांगी। तब महाराजा जयपुर, महाराजा अलवर, महाराजा कपूरथला, महाराजा कासिम बाजार, काशी नरेश आदि 25 रियासतों ने सेनापतियों के नेतृत्व में अपनी फौजें भीमगोडा के मैदान में भेज दी। उग्र आंदोलन को देखते हुए 1915 के कुंभ तक अंग्रेज रुक गए।
लेकिन कुंभ के बाद भी बांध नहीं बनाने दिया गया। दिसंबर 1916 में अंग्रेज सरकार झुक गई। महामना ने उसी समय पुरोहितों की संस्था गंगा सभा की स्थापना की। अंग्रेजों और पुरोहितों के बीच लिखित समझौता हुआ जो आज भी कायम है। बाद में बांध चंडी पर्वत के नीचे बहने वाली नीलधारा पर बनाया गया। ब्रह्मकुंड पर गंगा की अविच्छिन्न धारा निरंतर बह रही है।