- केंद्र की तत्कालीन भाजपा सरकार ने उत्तराखंड की स्थायी राजधानी घोषित न कर भूल की
- फैसला पहली निर्वाचित सरकार पर छोड़ा, देहरादून को अस्थायी राजधानी बना दिया
- अंतरिम सरकार ने राजधानी तय करने के लिए एक सदस्यीय आयोग बना दिया, छह महीने में रिपोर्ट मांगी
- आयोग में मात्र एक व्यक्ति होने और जरूरी सुविधाओं के अभाव में छह महीने में इस्तीफा दे दिया
- पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने आयोग को विस्तार दिया
- छह साल में आयोग को करीब 11 विस्तार दिए, तब जाकर रिपोर्ट आई
- तब से गैरसैंण में विस भवन बन गया, ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित हो गई, लेकिन स्थायी राजधानी की पहेली अब भी जस की तस है
भाजपा ने गलती की। बिना राजधानी का राज्य दिया। मेरा 21 साल का अनुभव है कि राजनीतिक नेतृत्व ठीक से फैसला नहीं कर पाया। दिशा नहीं दे पाया। ग्रीष्मकालीन राजधानी पर्वतीय वोटों को साधने का उपाय है। कांग्रेस नेताओं का संकल्प है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाएंगे।
- धीरेंद्र प्रताप, पूर्व अध्यक्ष राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद
भाजपा की तत्कालीन केंद्र सरकार ने स्थायी राजधानी का विकल्प खुला छोड़ दिया। ऐसा देश के किसी और प्रदेश के साथ नहीं हुआ। झारखंड व छत्तीसगढ़ की राजधानियां घोषित हुईं। उत्तराखंड को लेकर अगस्त 2000 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश को पत्र लिख दिया कि जब तक स्थायी राजधानी नहीं हो जाती, तब तक देहरादून अस्थायी राजधानी होगी। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाये जाने से साफ हो गया कि उसका स्थान दूसरे दर्जे का है।
- इंद्रेश मैखुरी, भाकपा नेता
राज्य से पहले राजधानी तय हो गई थी। नब्बे के दशक में यूकेडी ने वीरचंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर नाम दिया, लेकिन राज्य गठन के 20 साल बाद भी राज्य की स्थायी राजधानी तय नहीं हो सकी। पहाड़ की राजधानी पहाड़ में हो, गैरसैंण इस अवधारणा की प्रतीक थी। चूंकि राज्य में पहाड़ केंद्रित नीतियों का अभाव है, इसलिए ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित हो गई। जबकि आज तक उसका कोई ब्लू प्रिंट सामने नहीं आया है।
- रविंद्र जुगरान, वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी