शंकर सिंह जब सीमा पर शहीद हुए तो शुक्रवार की देर शाम को ही गांव में खबर पहुंच गई, लेकिन उनकी माता को यह दुखद समाचार नहीं सुनाया गया। शनिवार की सुबह जब गांव के लोग वहां पहुंचने लगे तो उन्हें कुछ अनहोनी की आशंका हुई। उन्होंने पूछा कि कहीं उनके शंकर के साथ कुछ हुआ तो नहीं। फिर जब बेटे की शहादत की खबर उन्हें दी गई तो वह गश खाकर गिर पड़ीं।
तब से वह पूरी तरह से बदहवास हैं। शंकर सिंह की पत्नी इंद्रा भी पति के शहीद होने की सूचना के बाद से बेसुध हैं। पिता मोहन सिंह खबर सुनने के बाद से गुमसुम हैं। ज्वाल गांव ब्याही गई शंकर सिंह की बड़ी बहन मंजू भंडारी के भी भाई के शहीद की सूचना के बाद आंसू थम नहीं रहे हैं। शनिवार को बड़ी संख्या में लोगों ने शहीद के घर पहुंचकर सांत्वना दी।
शंकर सिंह के शहीद होने की खबर मिलने के बाद जहां माता-पिता, पत्नी सहित अन्य परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं शहीद का मासूम बेटा हर्षित अपने पिता की शहादत से अंजान है। उसे यह भी पता नहीं कि अब उसके सिर पर पिता का साया नहीं रहा।
सैन्य पृष्ठभूमि का है शहीद शंकर का परिवार
सीमा की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले शंकर सिंह का परिवार सैन्य पृष्ठभूमि का है। शहीद शंकर सिंह के दादा भवान सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा था। शंकर सिंह के पिता ने भी सेना को ही चुना और राष्ट्रीय राइफल में भर्ती हुए। देश सेवा के बाद उन्होंने वर्ष 1995 में सेवानिवृत्ति ली।
पिता और दादा के नक्शेकदम पर शंकर सिंह और उनके छोटे भाई नवीन सिंह ने भी देश सेवा को ही लक्ष्य बनाया। शंकर सिंह के छोटे भाई नवीन सिंह सात कुमाऊं में जम्मू-कश्मीर में तैनात हैं।
जनवरी में छुट्टी आए थे शंकर सिंह
शहीद शंकर सिंह जनवरी में छुट्टी पर घर आए थे। एक माह की छुट्टी पूरी करने के बाद ही फरवरी में यूनिट लौट गए थे। इससे पहले वह महाकाली मंदिर में सेना की ओर से किए गए धर्मशाला के निर्माण के दौरान भी आए थे।