लेखक/ संपादक अनूप बाजपेयी
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तो हमारे युवा दुनियाभर में अलग तरह से पहचाने जाएंगे
25 साल में हम पलायन रोक नहीं पाए हैं। गांव खाली हो रहे हैं। न लोगों की वापस बुला सके। युवा शक्ति उस पहाड़ पर रुकना नहीं चाहती जहां से दुनिया नहीं जुड़ती है। नया ट्रेंड देखें तो अब शहरी आबादी से दूर लोग अपना बेस बना रहे हैं। दुनिया भी सिमट गई है इसलिए न तो दस से पांच की नौकरियां हैं और न ही ऑफिस में बैठकर काम करने का तौर तरीका। ऐसे में ऐसी इंडस्ट्री और ऐसे होनहारों को अपने विकास पथ में जोड़ने की आवश्यकता है जो स्टडी होम रिसर्च हो रिसर्च एंड डेवलेपमेंट डेटा सेंटर और एआई सर्च लैब को इस धरती पर उतार सकते हैं। इससे विकास में हमें पर्यावरणीय नुकसान भी नहीं उठाना होगा। हमारे युवा दुनिया में अलग तरह से पहचाने जाएगे।
दिल्ली व हरियाणा, पंजाब, यूपी के तमाम शहर जो धुआं, धूल और फेफड़ों की बीमारी में जकड़ते जा रहे हैं और खुद को फ्रेश फील कराने के लिए वीक एंड में दौड़े चले आते हैं। अगर उनकी तर्ज पर हम भी विकास की गगनचुंबी इमारतें, निजी वाहनों की होड़ और कूड़े के पहाड़ खड़े कर लेंगे तो उत्तराखंड बुलाता भी रहेगा तो भी मुसाफिर नहीं आएगा। हमें अपने प्राकृतिक संसाधन को किसी भी कीमत पर नष्ट होने से बचाना होगा, जिसकी आने वाले वर्षों में मुंह मांगी कीमत मिलेगी। जिस तरह से हमारे पूर्व मुख्यमंत्रियों ने जिन स्कूलों में पढ़ाई की, उन्हें भुला दिया वैसे ही हमने मेडिकल कालेजों में जिन्हें पढ़ाया उन्हें भी अधिक रकम देकर पहाड़ नहीं चढ़ा पाए। उत्तराखंड के पास हेल्थ सेक्टर को नया रूप देने का भरपूर मौका है। हमें राज्य के तीन से चार ऐसे जिले चिन्हित करने चाहिए जो शोरगुल से दूर, प्राकृतिक छटा के करीब और प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन देते हैं।
परंपरा को भी संजोकर रखना जरूरी
ऐसे जिलों की पहचान हम दुनिया में लम्वारी हेल्थ केयर के तौर पर करा सकते हैं। ये हमारी आमदनी का बड़ा जरिया बन सकेंगे और उन डॉक्टरों को भी आमंत्रित कर सकेंगे जी हमारे हैं। इस कड़ी में स्वाभाविक है हमारे सरकारी अस्पतालों को भी एक पुश मिल सकेगा, स्वास्थ्य का ढांचा भी मजबूत बनेगा। हमें हजारों साल की विरासत में खूबसूरत पर्यटक स्थल और प्राचीन तीर्थ स्थल मिले हैं। हम जितने लोगों को आमंत्रित करते हैं उससे कहीं अधिक हर साल बढ़ते जा रहे हैं। हमारी पहचान तमाम धार्मिक यात्राओं से भी है। आने वाले मेहमानों के लिए हम राज्य के खजाने से करोड़ों खर्च करते हैं। हमें उस परंपरा को भी संजोकर रखना है। सुविधाओं के साथ ही संतुलन और नियंत्रण पर भी काम करना होगा। हम सब को मिलकर इन पंक्तियों के साथ आगे बढ़ना होगा, जो बीत गया सो बीत गया उसको बिसार दो, आगे जीवन सुंदर है उसको तुम अकार दो।
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