...तब अचानक जंगलों पर जैसे आक्रमण हो गया
मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान जंगलों के भीतर लोगों की आवाजाही पूरी तरह से प्रतिबंधित थी। जब प्रतिबंधों में ढील दी गई, तो इससे जंगलों में लोगों का अचानक जैसे आक्रमण हो गया। उस दौरान जंगल की जमीन सूखी पत्तियों से भरी थी। वरिष्ठ पारिस्थितिकी वैज्ञानिक एसपी सिंह का कहना है कि इस दौरान जंगल की आग के लिए तमाम जैव और भौतिक कारक तैयार हो गए थे। जैसे ही लॉकडाउन खुला, तमाम पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गईं। यही सब जंगलों में आग का बड़ा कारक बने।
आग जानबूझकर लगाई जाती
पर्यटन और अन्य आर्थिक गतिविधियां भीं वजहमार्च 2020 से मई 2020 तक की लॉकडाउन अवधि के दौरान आईआईटी बॉम्बे और आईआईआरएस के वैज्ञानिकों ने जंगल की आग और मानव हस्तक्षेप के बीच संबंधों के बारे में एक अध्ययन किया। आईआईआरएस देहरादून के वरिष्ठ वैज्ञानिक अरिजीत रॉय के अनुसार, अध्ययन में जंगल की आग के लिए 70 प्रतिशत सीधे पर्यटन और अन्य आर्थिक गतिविधियों कारक के रूप में सामने आई हैं। इधर, सीईडीएआर के निदेशक (अनुसंधान) विशाल सिंह ने कहा कि इनमें से ज्यादातर आग की घटनाएं सड़कों के किनारे से शुरू हुईं। यह खुद ही इस बात का संकेत है कि आग जानबूझकर लगाई जाती है।
नवंबर 2020 से जून 2021 के बीच वनाग्नि के आंकड़े
राज्य- वनाग्नि
उड़ीसा- 51,968
मध्यप्रदेश- 47,795
छत्तीसगढ़- 38,106
महाराष्ट्र- 34,025
झारखंड- 21,713
उत्तराखंड- 21,487
आंध्रप्रदेश- 19,328
तेलंगाना- 18,237
मिजोरम- 12,846
असम- 10,718
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नवंबर 2021 से जून 2022 के बीच वनाग्नि के आंकड़े
राज्य - वनाग्नि
मध्यप्रदेश- 32,728
छत्तीसगढ़- 25,972
महाराष्ट्र - 22,052
उड़ीसा - 22,014
आंध्रप्रदेश- 14,138
तेलंगाना - 13,737
उत्तराखंड- 12,985
झारखंड- 9,419
मिजोरम- 8,734
असम- 8,158
(एनएसआई के डाटा के अनुसार)