युवा पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड का दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का बेशक गौरव प्राप्त हुआ है, लेकिन उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के साथ ही वह चुनौतियों के चक्रव्यूह में खड़े नजर आएंगे। चक्रव्यूह का सबसे पहला द्वार उपचुनाव की परीक्षा होगी। अमर उजाला ने उन चक्रव्यूह की अन्य चुनौतियों की पड़ताल की। पेश ये रिपोर्ट:
उपचुनाव की चुनौती
धामी के सामने सबसे पहली चुनौती उपचुनाव की होगी। वह चुनाव हारने के बावजूद मुख्यमंत्री बने हैं। इस पद पर बने रहने के लिए उन्हें सबसे पहले उपचुनाव जीतकर विधानसभा की सदस्यता हासिल करनी है। उनके लिए पांच विधायक पहले ही अपनी सीट खाली करने का एलान कर चुके हैं। धामी को ऐसी सीट का चयन करना है जहां उनकी चुनावी डगर आसान हो।
केंद्र की उम्मीदों पर खरा उतरना
चुनौतियों के चक्रव्यूह का दूसरा द्वार केंद्रीय नेतृत्व की उम्मीदों का है, जिन पर खरा उतरने की चुनौती धामी के सामने है। पीएम नरेंद्र मोदी एलान कर चुके हैं कि अगला दशक उत्तराखंड होगा। 2025 तक उत्तराखंड आदर्श राज्य होगा। मोदी के इस विजन को जमीन पर उतारने की चुनौती धामी के सामने है। इसके बाद शहरी निकाय चुनाव, फिर 2024 का लोकसभा चुनाव की चुनौती धामी के सामने होगी।
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सरकार और संगठन समन्वय
मुख्यमंत्री के तौर पर धामी के सामने तीसरी बड़ी चुनौती सरकार और संगठन के मध्य समन्वय की है। चुनाव जीते विधायकों से लेकर पार्टी के काम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की अपनी सरकार से बहुत अपेक्षाएं होती हैं। इन अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को किस हद तक पूरा और नियंत्रित कर पाएंगे, यह धामी के राजनीतिक कौशल पर निर्भर करेगा। सियासी जानकारों को मानना राजकाज सहज ढंग से चलाने के लिए जरूरी है कि सरकार और संगठन में बेहतर समन्वय हो।
दायित्वों के बंटवारे चुनौती
उत्तराखंड की सत्ता में दायित्वों का बंटवारा सबसे बड़ा सिरदर्द है। सरकार बनने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, पूर्व विधायकों, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की निगाहें सरकारी दायित्वों पर होती हैं। त्रिवेंद्र सरकार में संगठन के भीतर नाराजगी की एक बड़ी वजह दायित्वों के बंटवारे में देरी भी मानी गई। धामी के लिए दायित्वों का बंटवारा किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
बेलगाम नौकरशाही पर अंकुश
मुख्यमंत्री की भूमिका में अपनी छोटी लेकिन तेजतर्रार पारी में धामी ने नौकरशाही पर लगाम कसने की कोशिश की। उनकी एक कुशल प्रशासक की छवि बनी भी। अब पार्टी ने उन्हें पांच साल के लिए सत्ता की कमान सौंपी है। इन पांच साल में वह बेलगाम नौकरशाही पर अंकुश लगा पाएंगे, उनके लिए यह कम बड़ी चुनौती नहीं होगी।
चुनावी वादों को पूरा करना है
चुनावी चक्रव्यूह की एक बड़ी चुनौती चुनावी वादों को पूरा करने की भी है। धामी को पार्टी के दृष्टिपत्र को लागू करना है। उन पर समान नागरिक संहिता, भू कानून, जनसंख्या नियंत्रण सरीखे वादों को भी पूरा करने का दबाव रहेगा।
जीरो टॉलरेंस की नीति
चुनाव में भाजपा ने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस बड़ा मुद्दा नहीं बनाया, लेकिन राज्य में भ्रष्टाचार सबसे प्रमुख मुद्दा रहा है। खनन, शराब, जमीन और सरकारी ठेकों में भ्रष्टाचार के मामले हर सरकार में प्रमुखता से उजागर होते रहे हैं। धामी सरकार के सामने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति को लागू करना बड़ी चुनौती होगी। वह भी उस रूप में जब विपक्ष मुख्यमंत्री कार्यालय पर ही कई बार सवाल उठाता रहा है।