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उत्तराखंडः कुमाऊं की उपेक्षा की भरपाई होने की तीरथ सिंह रावत से उम्मीद

Thu, 11 Mar 2021 10:07 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal गिरीश रंजन तिवारी, अमर उजाला, नैनीताल
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तीरथ सिंह रावत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के प्रति कुमाऊं के विधायकों ने अंतिम समय में मोर्चा खोल दिया था। उनमें रावत की कार्यप्रणाली को लेकर खासा रोष था लेकिन यह रोष अकारण नहीं था। आश्चर्य है कि पूरा जीवन राजनीति में बिताने के बावजूद रावत इसके पीछे की मामूली वजह नहीं ताड़ पाए।

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अब तीरथ सिंह रावत के आने से कुमाऊं के तमाम वरिष्ठ विधायकों में फिर आस जगी है कि उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। खासकर ठाकुर समुदाय से बिशन सिंह चुफाल, पुष्कर सिंह धामी या पूरन सिंह फर्त्याल को कैबिनेट पद मिलना तय माना जा रहा है। 
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वर्ष 2017 के चुनाव में कुमाऊं में कुल 29 में से 23 सीटें भाजपा को मिली थीं। गढ़वाल से भाजपा को अपेक्षाकृत कम यानी 41 में से 28 सीटें मिलीं। इसके बावजूद त्रिवेंद्र कैबिनेट में कुमाऊं को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। कुमाऊं के छह में से चार महत्वपूर्ण जिलों नैनीताल, पिथौरागढ़, चंपावत और बागेश्वर से वर्तमान में एक भी मंत्री नहीं था।

पूर्व वित्त मंत्री प्रकाश पंत के निधन के बाद से खाली पड़े कैबिनेट पद पर भी नियुक्ति नहीं की गई। कुमाऊं के ठाकुर नेताओं की अनदेखी हुई। पूर्व में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री और वर्ष 1996 से अब तक लगातार पांच बार विधायक रहे बिशन सिंह चुफाल, तीन बार विधायक रहे स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह जीना, दो बार विधायक रहे पुष्कर सिंह धामी और पूरन सिंह फर्त्याल सहित दीवान सिंह बिष्ट को मौका नहीं दिया गया जबकि गढ़वाल से मुख्यमंत्री सहित चार ठाकुर नेता मंत्रिमंडल में शामिल किए गए। यह एक संयोग ही था कि वे चारों ही रावत थे।

कुमाऊं से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को पराजित करने वाले राजेश शुक्ला हों या 1993 से छह बार विधायक रहे पूर्व मंत्री बंशीधर भगत, उन्हें भी कैबिनेट में जगह नहीं मिल सकी। खास बात यह है कि कैबिनेट के तीन पद खाली थे, मुख्यमंत्री को केंद्र से इन पर नियुक्ति की खुली छूट थी। इन पदों पर नियुक्ति कर इस असंतुलन को आसानी से साधा जा सकता था। बहरहाल कुमाऊं के लोगों में अब फिर यह उम्मीद जगी है कि त्रिवेंद्र रावत की इस कमी को तीरथ कैबिनेट में सुधारा जाएगा और कुमाऊं को समुचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। (संवाद)

कांग्रेस कुमाऊं से और भाजपा गढ़वाल से बनाती रही सीएम

इसे संयोग ही कहा जाना चाहिए कि उत्तराखंड के अब तक के इतिहास को देखा जाए तो मामूली अपवाद के सिवाय यह एक तथ्य है कि कांग्रेस के सभी मुख्यमंत्री कुमाऊं और भाजपा के मुख्यमंत्री गढ़वाल से ही बनते रहे हैं। राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी थे। वर्ष 2002 में हुए राज्य के पहले चुनाव से चार माह पूर्व भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया था।

चुनाव में कांग्रेस के बहुमत के बाद एनडी तिवारी सरकार बनी। बाद में कांग्रेस से गढ़वाल के विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने लेकिन तब हुए उपचुनाव में वे कुमाऊं के सितारगंज से विधायक चुने गए। इस नाते यह पद कुमाऊं के कोटे में आया। हरीश रावत भी कुमाऊं से मुख्यमंत्री रहे। भाजपा के शेष सभी मुख्यमंत्री भी गढ़वाल से ही रहे।
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कमिश्नरी के बजाय गैरसैंण सहित अन्य जिले गठित कर जीत सकते हैं दिल

गैरसैंण को बगैर सोचे समझे कमिश्नरी बनाने की घोषणा त्रिवेंद्र सिंह रावत को बहुत भारी पड़ी। आम लोगों खासकर कुमाऊं में भाजपा के भीतर और बाहर भी लोगों को यह निर्णय बिल्कुल नहीं सुहाया। ऐसे में इससे सबक लेकर तीरथ सिंह रावत गैरसैंण को कमिश्नरी के बजाय जिला बना कर भाजपा की खोई साख बहाल कर सकते हैं।

इसके अलावा भी कुमाऊं में रानीखेत, डीडीहाट और काशीपुर जिले की मांग बहुत पुरानी और बहुत जायज है। रानीखेत और डीडीहाट तो कुछ वर्ष पूर्व जिला बनते बनते अंतिम समय में रह गए थे। तीरथ चाहें तो इन जिलों के निर्माण की पुरानी मांग पूरा कर कुमाऊं में अपनी बढ़त बना सकते हैं।

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