देहरादून कैंट के शांत माहौल में बना मुख्यमंत्री आवास मंगलवार को काफी चहल-पहल से भरा नजर आया। जैसे ही मुख्यमंत्री दिल्ली से लौटकर आवास में पहुंचे तो कार्यकर्ताओं का हुजूम जुटना शुरू हो गया। त्रिवेंद्र लगातार कार्यकर्ताओं से बातचीत करते रहे।
अपनी चार साल की पारी में उन्होंने जो कमाया, उसका नजारा उनके सामने था। लोगों की आंखों से आंसू टपक रहे थे। कार्यकर्ता अचानक हुए इस फैसले से खुश नहीं थे। उनका कहना था कि आखिर अचानक ऐसी क्या मजबूरी आ गई कि पांच साल पूरे नहीं करने दिए गए।
दोपहर करीब 12 बजे मुख्यमंत्री आवास में कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ा हुआ था। जैसे ही त्रिवेंद्र उनके बीच पहुंचे तो कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी शुरू कर दी। जैसे सभी कह रहे थे कि आप संघर्ष करो, हम आपके साथ हैं। हालांकि, त्रिवेंद्र को यह पता था कि अब उनका इस पद पर बने रहने का समय खत्म हो चुका है।
लिहाजा, वह जमीन पर बैठकर ही कार्यकर्ताओं से बात करने लगे। वह उन्हें समझाने वाले लहजे में नजर आए। वह लगातार कह रहे थे कि जो हुआ संगठन ने बेहतर किया है। आगे भी जो होगा, बेहतर ही होगा।
दिनभर मुख्यमंत्री आवास में विधायकों, पार्टी कार्यकर्ताओं का आना-जाना लगा रहा। आवास के बाहर दोपहर बाद तक भी विधायक मुन्ना सिंह चौहान यही कहते रहे कि कहीं कोई परेशानी नहीं है। कोई भी विधायक नाराज नहीं है।
अभी तक मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ही हैं, लेकिन चार बजे से अफवाहों का सिलसिला थमना शुरू हुआ तो सबने ‘खामोशी की चादर’ ओढ़ ली। मुख्यमंत्री राजभवन से लौटकर सीधे पत्रकारों के बीच पहुंचे और वहां प्रेसवार्ता में उन्होंने अपने इस्तीफे की जानकारी दी। इसके बाद वह लौटकर मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो फिर कार्यकर्ताओं ने उन्हें घेर लिया।
वह आवास के बाहर लॉन में ही बैठ गए। उनके साथ उच्च शिक्षा राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत, विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन, मेयर सुनील उनियाल गामा, भाजपा नेता अनिल गोयल सहित तमाम पदाधिकारी भी वहीं बैठ गए। इस बीच बाल आयोग की अध्यक्ष ऊषा नेगी कई महिला कार्यकर्ताओं के साथ उनके सामने थी। वह इस फैसले पर भावुक हो गई।
बमुश्किल आंसू रोकते हुए त्रिवेंद्र से बोलीं- आखिर ऐसा भी क्या था। पलटकर त्रिवेंद्र ने सवाल किया कि भगवान राम का क्या अपराध था तो कार्यकर्ताओं ने कहा कि वह समय और था। यह कलयुग है। कुल मिलाकर वह सभी इस फैसले से खफा नजर आईं। बात को बीच में छोड़कर त्रिवेंद्र आवास के अंदर चले गए। इसके बाद भी देर शाम तक कार्यकर्ता वहां से जाने का नाम नहीं ले रहे थे।