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जंगली खुमानी चुल्लू पर संकट, मौसम की मार और वनीकरण नहीं होने से घट रहे पेड़

Fri, 30 Oct 2020 12:52 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सूरत सिंह रावत, अमर उजाला, उत्तरकाशी

सार

  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार में है चुल्लू के तेल की मांग
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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विस्तार
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आर्थिकी के साथ ही जैव विविधता के संरक्षण में मददगार चुल्लू अब मौसम की मार और वनीकरण के अभाव में गायब होने लगा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी बनने की क्षमता रखने वाले चुल्लू के तेल की बादाम के तेल के विकल्प के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खूब मांग है। 

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खुमानी की जंगली प्रजाति चुल्लू घाटी से लेकर उच्च हिमालयी क्षेत्र के गांवों में प्राकृतिक रूप से खूब पैदा होता है। जिले की गंगा और यमुना घाटी में चुल्लू के पेड़ बहुतायत में पाए जाते थे, लेकिन अब मौसम की मार और वनीकरण के अभाव में इन पेड़ों की संख्या बढ़ नहीं पा रही है। पुराने पेड़ जर्जर होकर खत्म होते जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मददगार यह जंगली फल तेजी से सिमटता जा रहा है।

चुल्लू की गिरी से निकलने वाला तेल बादाम तेल के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होता है। यह बाजार में आसानी से एक हजार रुपये लीटर तक बिक जाता है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर एवं लाहौल स्पीति क्षेत्र में तो सूखे चुल्लू आठ सौ रुपये किलो की दर से बाजार में बिक रहा है। इसके अलावा इससे कई अन्य खाद्य उत्पाद भी तैयार किए जा सकते हैं।
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तेल एवं सूखे मेवे सहित कई उत्पाद तैयार होते हैं चुल्लू से

हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर (हार्क) के सचिव महेंद्र कुंवर बताते हैं कि नौगांव पुरोला क्षेत्र में 90 के दशक में किए गए सर्वे में यहां चुल्लू के 360 मीट्रिक टन तेल और 2400 मीट्रिक टन पल्प उत्पादन क्षमता का आकलन किया गया था। हार्क चमोली जनपद के कालेश्वर में कोल्ड प्रेस मशीन से चुल्लू का तेल तैयार करने के साथ ही एप्रीकॉट बार और चटनी तैयार कर रहा है। इससे ग्रामीणों को अच्छा मुनाफा मिल रहा है। उन्होंने चुल्लू की गिरी तोड़ने वाली मशीन भी बनाई है। 

चुल्लू के वनीकरण को बढ़ावा दे सरकार

रवाईं घाटी फल एवं सब्जी उत्पादक एसोसिएशन के अध्यक्ष जगमोहन, पौंटी गांव के किताब सिंह, हर्षिल के डा.नागेंद्र रावत, धराली के महेश पंवार आदि ने बताया कि बीते कई दशकों से चुल्लू के वनीकरण पर न तो ग्रामीण ध्यान दे रहे हैं और न ही सरकारी विभाग। नतीजतन साल दर साल चुल्लू के पेड़ कम होते जा रहे हैं। यही हाल रहा तो आने वाले समय में लोग चुल्लू की चटनी तक से वंचित हो जाएंगे। सरकार को इसके संरक्षण के लिए योजना बनानी चाहिए।

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