मडुवे का उपयोग मिठाई (बर्फी) के रूप में भी हो रहा है। खास तरीके से निर्मित मडुवे की इस मिठाई का पहली बार चंपावत में उत्पादन शुरू हुआ है। हर रोज एक क्विंटल से अधिक मिठाई का उत्पादन हो रहा है। 500 रुपये किलो के बावजूद इसकी मांग चंपावत और प्रदेश से बाहर तक है।
मिठाई निर्माता और व्यापार संघ जिलाध्यक्ष प्रकाश तिवारी, उद्यमी कविता तिवारी बताती हैं कि खास स्वाद और मौसम के लिए मुफीद होने से इसकी भरपूर मांग है। इस मिठाई की सोशल मीडिया में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी प्रशंसा कर चुके हैं। वहीं गत शनिवार को नरियालगांव में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी इस मिठाई को बनाने के लिए मिठाई उत्पादक प्रकाश तिवारी की पीठ थपथपाई।
तेजी से मांग बढ़ने से मडुवा किसानों को लुभा रहा है। स्थानीय फसलों को प्रोत्साहित करने और अब परंपरागत कृषि विकास योजना से मिलने वाले बीज और जुताई के लिए 300 रुपये हेक्टेयर राशि से किसान इसकी खेती को अपना रहा है। साथ ही सहजता से इसका बाजार भी उपलब्ध है।
- राजेंद्र उप्रेती, मुख्य कृषि अधिकारी
मडुवे में कैल्शियम, विटामिन, लौह, खनिज एवं प्रोटीन होता है। रेशायुक्त होने से पाचन तंत्र को भी सक्रिय रखता है।
- डॉ. जीएस चौहान, आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी
पहाड़ में कभी बहुतायत में होने वाले मडुवे को हेय दृष्टि से देखा जाता था। इसे गरीबों का अनाज माना जाता था। तब मडुवे के गुणों से लोग अनजान थे। हाल के वर्षों में हुए शोध में मडुवे के कैल्शियम, विटामिन, लौहखनिज आदि से भरपूर होने का पता चला तो मडुवे के प्रति लोगों की दृष्टि बदली।
इसके बाद तो मडुवे के केक, बर्फी, बिस्किट भी बनने लगे। जो लोग कभी मडुवा नहीं खाते थे, अब वे भी ढूंढ-ढूंढ कर मडुवा खाने लगे, लेकिन अब मडुवे की खेती ही कम होने लगी है। बागेश्वर जिले में मडुवा ही नहीं मक्के और धान की खेती भी कम हो गई है।
कृषि विभाग के पिछले 11 वर्षों के आंकड़े देखें तो बागेश्वर जिले में मडुवे का उत्पादन लगातार घटता जा रहा है। 11 वर्ष में कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाए तो उपज के साथ ही खेती का रकबा भी घटा है। केवल चौलाई की पैदावार बढ़ी है।
सरकारें किसानों की आय दोगुना करने के दावे लगातार कर रही हैं। इसके लिए कई योजनाएं चल रही हैं। कृषि फार्मिंग बैंक बनाकर किसानों को कम दरों पर कृषि यंत्र उपलब्ध कराए जा रहे हैं लेकिन इसके बावजूद कृषि का क्षेत्रफल और उत्पादन भी घट रहा है। पलायन, जंगली जानवरों का आतंक जैसे कारणों से भी लोग खेती से विमुख हो रहे हैं, इनसे भी खेती का रकबा घट रहा है।
वर्ष - कुल क्षेत्रफल हेक्टेयर में - उत्पादन मीट्रिक टन - औसत उपज क्विंटल प्रति हेक्टेयर
2008-09 - 5878 - 9458 - 16.09
2017-18 - 5401 - 5768 - 10.68
2018-19 - 6517 - 6565 - 10.07
पलायन से किसान घटे, जानवरों के आतंक से खेती प्रभावित
बागेश्वर जिले में पलायन के कारण किसानों की संख्या में भी कमी आई है। 10 वर्ष पहले जिले में करीब 52 हजार किसान खेती करते थे। अब 47521 किसान ही खेती कर रहे हैं। जंगली जानवरों के आतंक के कारण भी लोग खेती से विमुख हो रहे हैं।
खोली निवासी किसान मोहन सिंह, हयात सिंह परिहार, अमतौड़ा निवासी किसान हरीश सिंह बिष्ट, बिलौना के किसान सुरेश पांडे का कहना है कि सरकार को कृषि को बढ़ावा देने के लिए कम से कम जंगली जानवरों से निजात दिलानी होगा। सिंचाई के पुख्ता इंतजाम करने होंगे।
पलायन और अन्य कारणों से किसानों की संख्या घटी है। पहले जिले में 52 हजार कृषक थे। वर्तमान में 47521 किसान रह गए हैं। जिले में आर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। अच्छी किस्म के बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। 60 कृषि फार्मिंग बैंकों की स्थापना की गई है। प्रवासियों के लौटने से भी आने वाले समय में कृषि उपज बढ़ेगी।
- वीपी मौर्य मुख्य कृषि अधिकारी बागेश्वर