विधानसभा चुनाव के समर में उतरने से पहले कांग्रेस की सियासी चाय की प्याली में तूफान है। यह तूफान आया है पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ताबड़तोड़ बैटिंग से।
हारीश रावत पार्टी के मुद्दों को सोशल मीडिया के फ्लेटफार्म पर भी ले आए हैं, जिससे पार्टी असहज महसूस कर रही है। रावत भी बिना लागलपेट के मुद्दों को उठा रहे हैं, अपना दृष्टिकोण साफ कर रहे हैं, कहीं उकसा रहे हैं तो कहीं नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। इन्हीं में से कुछ मुद्दो पर अमर उजाला से हरीश रावत ने बेबाक राय जाहिर की है।
- आपने चुनाव में नई रणनीति के तहत उतरने की बात की। कहा जा रहा है कि आप मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कर रहे हैं और इस वजह से यह बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं?
- मेरी समझ में यह बात नहीं आई। दिक्कत तो तब होनी चाहिए थी, जब हरीश रावत कहता कि मैं हूं और कोई नहीं। मैनें तो कहा है कि चुनाव का चेहरा घोषित करो, मैं पीछे खड़ा हूं। इसके लिए बाकायदा प्रीतम और इंदिरा हृदयेश का नाम भी लिया। जब भी चेहरे की बात होगी, मेरा नाम स्वाभाविक रूप से आएगा। इसके लिए मैंने स्पष्ट किया कि मैं दावेदार नहीं हूं।
- प्रदेश में सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने की रणनीति से आप इनकार कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि चेहरा घोषित करने की यह परंपरा कभी रही ही नहीं?
- भाजपा ने अपनी रणनीति बदल ली है तो हमें भी अपनी रणनीति बदल लेनी चाहिए। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे कर हर चुनाव लड़ रही है। इसका तोड़ क्या है। इसीलिए मैंने कहा कि स्थानीय स्तर पर पार्टी का चेहरा घोषित किया जाए। प्रदेश में त्रिवेंद्र रावत बनाम प्रीतम, इंदिरा हो जाने दो। स्थानीय राजनीति का भी भला होगा। मैंने तो यहां तक कहा है कि युवा नेतृत्व को बागडोर सौंपें, उनको आगे आने दें। भाजपा जब अपनी रणनीति बदल चुकी है तो फिर हम अपनी रणनीति क्यों नहीं बदल सकते?
- हरीश रावत सीडब्ल्यूसी के सदस्य हैं, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर यह बात क्यों नहीं करते?
- हरीश रावत पार्टी के स्थानीय वर्कर भी तो हैं। कुछ सवालों के जवाब स्थानीय स्तर पर ही सामने आ सकते हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय का भी तो सवाल है, बिना लागलपेट के इस पर मंथन कर एक रणनीति तय की जा सकती है।
- आप लगातार ट्वीट कर रहे हैं, सोशल मीडिया में इस बहस को ले आएं हैं, पार्टी फोरम में नेताओं के बीच में भी तो यह बात की जा सकती है?
- मैनें तो हल्द्वानी में कहा था कि एक समिति का गठन किया जाए जो इन मुद्दों पर विचार करे। यह बहस कार्यकर्ताओं, पार्टी नेताओं के बीच में होनी जरूरी है। पार्टी फोरम पर जब मौका मिला बात की गई।