वन कर्मियों को बाघ जिन वन्यजीवों का मसलन चीतल, हिरन आदि का शिकार करता है, उनके स्केट को एकत्र करने का भी प्रशिक्षण दिया गया। स्केट का सैंपल एकत्र करने के साथ संबंधित रेंज, बीट, लोकेशन आदि जानकारी के साथ उसे जांच के लिए भेजा जाएगा।
देश में बाघ आकलन के कार्य के तहत पहली बार उसके भोजन शृंखला की कुंडली तैयार करने की योजना है। दूसरे चरण में ट्रांजिट सर्वे (पारिस्थितिक सर्वेक्षण) के तहत हिरन, चीतल आदि के स्केट (मल) के सैंपल एकत्र किए जाएंगे। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार इन सैंपल के डीएनए जांच के माध्यम से बाघ जिनको खाता है, उनके स्वास्थ्य और उनके भी भोजन की स्थिति जानने की कोशिश की जाएगी।
विज्ञापन
बाघ आकलन के चार चरण होते हैं। इसमें पहला साइंस सर्वे और चरण ट्रांजिट सर्वे होता है। इसके बाद तीसरे चरण में कैमरा ट्रैप लगाया जाता है और आखिरी चरण में कैमरा ट्रैप से मिले फोटो आदि के माध्यम से बाघ आकलन की रिपोर्ट भारतीय वन्यजीव संस्थान तैयार करता है। यह एक तय प्रोटोकाल है जो हर जगह लागू होता है। अब पहली बार बाघ आकलन के साथ उसके वास स्थल की स्थिति का भी पता करने की योजना है।
सैंपल एकत्र करने का प्रशिक्षण दिया गया
बाघ की संख्या के दृष्टिगत वास स्थल और भोजन शृंखला अहम है। राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक कोको रोसे कहते हैं कि वन कर्मियों को बाघ जिन वन्यजीवों का मसलन चीतल, हिरन आदि का शिकार करता है, उनके स्केट को एकत्र करने का भी प्रशिक्षण दिया गया। स्केट का सैंपल एकत्र करने के साथ संबंधित रेंज, बीट, लोकेशन आदि जानकारी के साथ उसे जांच के लिए भेजा जाएगा।
भारतीय वन्यजीव संस्थान की वैज्ञानिक शिखा बिष्ट बताती है कि इस तरह का प्रयास पहली बार हो रहा है, इसमें बाघ जिन शाकाहारी वन्यजीवों को खाता है, उनका स्वास्थ्य कैसा है, यह पता किया जाएगा। इसके अलावा यह शाकाहारी वन्यजीव भी क्या खाते है, उसको भी पता किया जाएगा। साथ ही उदाहरण के तौर पर कार्बेट टाइगर रिजर्व में मिलने वाले हिरन किसी दूसरे राज्य में मिलने वाले हिरन एक ही है या आनुवांशिक तौर पर अलग- अलग हैं, यह सब जानकारी पता करने का प्रयास किया जाएगा। इसमें सैंपल की स्थिति कैसी है, वह महत्वपूर्ण होगा।