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अमर उजाला एक्सक्लूसिव: आय बढ़ाने की कवायद, खेती के इस आदर्श से फर्श से अर्श पर पहुंचेंगे किसान!

Mon, 19 Oct 2020 02:54 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal चंद्रशेखर जोशी, अमर उजाला, चंपावत
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
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कृषि प्रधान भारत में खेती ने कोरोना काल में एक बार फिर सहारा दिया। मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में सिर्फ कृषि में ही विकास दर सकारात्मक (3.40 प्रतिशत) रही। अब इस खेती में एकीकृत आदर्श कृषि (आईएमए) ग्राम योजना के सहारे नया आदर्श गढ़ने की पहल शुरू की गई है।

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योजना के तहत हर ब्लॉक में गांवों के एक-एक समूह (कलस्टर) के जरिये जैविक तरीके से खेती और उससे जुड़ी अन्य गतिविधियां होंगी। खेती के लिए जिले की आबोहवा खासी अनुकूल है। मैदानी क्षेत्र में गेहूं, धान और पहाड़ में मडुवा, गहत, मक्का, दलहन, सिटरस फल आदि की बहुतायत में खेती होती है।

 जिले के 39,347 किसान परिवार करीब 28 हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती करते हैं। कम जोत और बिखरी खेती के चलते न उत्पादन पर्याप्त होता है और न ही किसानों को मुनाफा। ऐसे में खेती को नई दिशा देने के लिए प्रदेश सरकार ने आईएएम ग्राम योजना शुरू की है।
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योजना के तहत ब्लॉक में एक-एक समूह के जरिये सामूहिक रूप से जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा, जिले के चारों ब्लॉकों में छह गांवों को मिलाकर चार समूह चयनित किए गए हैं। हर समूह में 100 किसानों को शामिल किया गया है। इनमें खेती, बागवानी, जड़ीबूटी, डेरी, पशुपालन, मत्स्यपालन को बढ़ावा दिया जाएगा। ये समूह नगदी फसल वाली खेती, दूध उत्पादन सहित  अपनी जरूरत के हिसाब से खेती कर सकेंगे। 

गठन के बाद सभी चारों समूहों को 15-15 लाख रुपये दिए जाएंगे। ये समूह अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से खेती और उससे संबंधित निर्णय ले सकेंगे। फसल की बिक्री और मूल्य निर्धारण का जिम्मा भी उनका होगा। समूह में कृषि संबंधी कार्य होने से कम लागत, अधिक उत्पादन और ज्यादा लाभ की संभावना होगी। 
- राजेंद्र उप्रेती, मुख्य कृषि अधिकारी

चंपावत जिले में चयनित समूह: 
ब्लॉक    -     समूह       -            खूबी 
चंपावत    -  बिरगुल बुंगाख्याली  -   उद्यान, पशुपालन। 
लोहाघाट -  सुदर्का          -      मडुवा और लाल चावल। 
पाट -     पखौटी-देवीधुरा   -          उद्यान। 
बाराकोट-  तल्ला बापरू     -            धान। 

जल्द होगा समूहों का गठन 

ब्लॉक स्तरीय समितियां इस माह के अंत तक समूहों के गठन की प्रक्रिया पूरी कर लेंगी। इसके लिए समिति के अध्यक्षों से जल्द बैठक कर इस प्रक्रिया को पूरी करने को कहा गया है। गठन के बाद ये समूह आपसी मंत्रणा से खेती और अन्य सभी गतिविधियों करेंगे। 

जरूरत पूरी करने को दूसरे जिलों पर हैं आश्रित 

खेती की बहुतायत पर भी जिला खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। गेहूं, धान, दलहन, तिलहन, फल और सब्जी की करीब 45951 मीट्रिक टन खपत है। जबकि जरूरत 59275 मीट्रिक टन खाद्यान्न की जरूरत है। इस जरूरत को दूसरे जिलों से पूरा किया जाता है।

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