प्रदेश कांग्रेस क्षत्रप माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश के लिए कांग्रेस आलाकमान का एक ही फरमान है। 2022 के विधानसभा चुनाव की डगर को आसान बनाने के लिए तीनों क्षत्रपों के बीच की दूरी खत्म करनी होगी।
प्रदेश कांग्रेस प्रभारी देवेंद्र यादव के सामने तीनों सियासी ध्रुवों ने एक केंद्र पर आने पर हामी भरी है। पार्टी आलाकमान का मानना है कि तीनों दिग्गज एकजुटता के साथ सियासी मैदान में उतरेंगे तो विपक्ष को पार्टी की आंतरिक मतभेदों को लेकर सवाल उठाने का अवसर नहीं मिल पाएगा। बता दें कि प्रदेश में जब-जब कांग्रेस हमलावर होती है, सत्तारूढ़ भाजपा उसके भीतर सुलग रही खेमेबाजी की दुखती रग को दबा देती है।
पार्टी प्रदेश प्रभारी की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित बैठक का एजेंडा मीडिया के सामने चाहे जो रखा गया हो, लेकिन राजनीतिक सूत्र इस बात को पुख्ता करते हैं, कि पार्टी आलाकमान चुनाव से पहले अपने घर के कील-कांटे दुरुस्त कर लेना चाहती है। यही वजह है कि पार्टी आलाकमान के निर्देश पर पार्टी प्रदेश प्रभारी तीनों दिग्गजों को लेकर दूसरे दौर की बैठक कर चुके हैं।
आलाकमान को भी इस बात इल्म है कि प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी डगर तब तक बहुत मुश्किल है जब तक पार्टी के क्षत्रप अपनी ढपली अपना राग अलापते रहेंगे। इसीलिए पार्टी प्रभारी की ओर से आलाकमान का संदेश साफ कर दिया गया कि विधानसभा चुनाव की जंग सामूहिक नेतृत्व में लड़ी जाएगी। साथ ही तीनों क्षत्रप पार्टी एकजुटता के साथ मैदान में उतर कर कांग्रेस की ताकत को बढ़ाएंगे।
यह संदेश साफ करना पार्टी की मजबूरी भी है। दरअसल, राज्य की राजनीति में जब-जब कांग्रेस ने प्रदेश के मुद्दों को लेकर आक्रामक तेवर के साथ मैदान में उतरी है, सत्ता पक्ष ने कांग्रेस के बीच खेमेबाजी को हवा देकर उसे हल्का कर दिया। प्रीतम सिंह भले इस वक्त प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभाल रहे हों और इंदिरा के पास नेता प्रतिपक्ष का दायित्व हो, लेकिन हरीश रावत को पार्टी किसी भी तरह से नजरअंदाज नहीं कर सकती है। हरीश की उत्तराखंड कांग्रेस में अपना एक जनाधार है।
सियासत में उनके अनुयायियों की अच्छी-खासी संख्या है। वो राज्य की सियासत में अकसर उथल-पुथल मचाते रहे हैं और दमदार तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। पार्टी अलाकमान भी इस बात को भली-भांति समझता है। इसलिए वह तीनों दिग्गजों को एक मंच पर लाकर जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं में एकता का संदेश देना चाहते हैं। यदि चुनाव से पूर्व पार्टी अलग-अलग खेमों बंटी नजर आती है तो नुकसान पार्टी को ही होना है।