जिले में तीन पर्यटन/धार्मिक स्थलों में रोपवे निर्माण के प्रस्ताव हैं। यह प्रस्ताव अलग-अलग समय में पर्यटन विकास निदेशालय के माध्यम से बनाए गए हैं। अभी तक इनका क्रियान्वयन नहीं हुआ है। वर्ष 2017 में पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के निर्देश पर पोखड़ा ब्लॉक में जलपाड़ी-दीवा का डांडा और जयहरीखाल क्षेत्र में कीर्तिखाल-भैरवगढ़ी रोपवे के लिए प्रारंभिक सर्वेक्षण हुआ था। अभी यहां 7 किलोमीटर की खड़ी पैदल चढ़ाई चढनी पड़ती है। भैरवगढ़ी भी खूबसूरत स्थान है। यहां भैरवनाथ का मंदिर है। यहां पहुंचने के लिए ढाई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने पौड़ी बाजार से क्यूंकालेश्वर मंदिर तक रोपवे निर्माण की घोषणा की थी। जिला पर्यटन विकास अधिकारी केएस नेगी का कहना है कि अभी रोपवे का काम शुरू नहीं हुआ है। प्रस्ताव संबंधी सारे कार्य निदेशालय स्तर पर हुए हैं।
उत्तरकाशी: यमुनोत्री रोपवे योजना शिलान्यास तक सीमित
जनपद में एक भी रोपवे संचालित नहीं हो रहा है। वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल व भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यमुना घाटी के खरसाली गांव में रोपवे योजना का शिलान्यास किया था। रोपवे का निर्माण यमुनोत्री यात्रा को सुगम बनाना था। इसके लिए खरसाली के ग्रामीणों की 75 नाली भूमि का अधिग्रहण भी किया गया था। करीब 4 किमी लंबी योजना का निर्माण 70 करोड़ की लागत से किया जाना था लेकिन निर्माण कार्य शिलान्यास से आगे नहीं बढ़ पाया। स्थिति यह है कि अब तक टेंडर प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो पाई है। वहीं दयारा बुग्याल में भी रोपवे प्रस्तावित था, जिस पर भी अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
रुद्रप्रयाग: केदारनाथ में मंजूर रोपवे सर्वे से आगे नहीं बढ़ा
मौजूदा समय में रुद्रप्रयाग जिले में कोई रोपेव नहीं है। जबकि केदारनाथ के लिए वर्ष 2005 से स्वीकृत रोपवे सर्वेक्षण से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। जबकि वर्ष 2018 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने भी जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांग चुका है। जून 2013 की आपदा के बाद से रोपवे निर्माण को लेकर पूर्व सीएम हरीश रावत ने भी तीन बार घोषणा की थी। वहीं, एक दशक पूर्व ऊखीमठ ब्लॉक के करोखी गांव में भी रोपवे निर्माण की योजना परवान नहीं चढ़ पाई। संवाद
हरिद्वार: मनसा और चंडी देवर के लिए रोप-वे की सुविधा
धर्मनगरी में मनसा देवी और चंडी देवी मंदिर के लिए रोपवे संचालन होता है। चंडी देवी नील पर्वत और मनसा देवी बिलवा पर्वत पर है। दोनों ही मंदिरों में श्रद्धालुओं के जाने के लिए पैदल रास्ता और रोपवे की सुविधा है। कोविडकाल में रोपवे संचालन बंद रहा, जो अब नियमित संचालित हो रहा है। बिलवा पहाड़ पर तीन किलोमीटर दूर स्थित मां मनसा देवी और नजीबाबाद हाईवे के ऊपर नील पर्वत पर करीब छह किलोमीटर दूर मां चंडी देवी का मंदिर है। उषा ब्रेेको लिमिटेड की ओर से रोपवे संचालित होता है। जिसमें प्रति श्रद्धालु निर्धारित शुल्क चंडी देवी 193 रुपये और मनसा देवी 122 रुपये आना-जाना लिया जाता है। इससे बुजुर्गों, बीमार, महिलाओं और बच्चों को मंदिरों तक पहुंचने में आसानी हो जाती है।
जिले में धार्मिक स्थलों के लिए रोपवे लगाने की घोषणा तो खूब हुई है, लेकिन रोपवे का निर्माण नहीं हुआ। जिले में वर्तमान में एक भी रोपवे नहीं है। अल्मोड़ा जिले में कहीं भी रोपवे नहीं हैं। राज्य बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने अल्मोड़ा नगर से कसारदेवी और पांडेखोला के अलावा स्याहीदेवी के लिए रोप-वे स्वीकृत किए थे ताकि अल्मोड़ा में पर्यटन गतिविधियों को गति मिल सके। रोप-वे बनना तो दूर इनका सर्वे तक का कार्य शुरू नहीं हो सका है। इसकी वजह से यह योजना धरातल पर नहीं उतर सकी है। कभी नैनीताल जिले का ही हिस्सा रहा ऊधम सिंह नगर मूलत: तराई क्षेत्र है। कभी यह हिस्सा मैदानी और दलदलीय हुआ करता था। अब यह जिला गन्ना-धान की खेती, औद्योगिक विनिर्माण इकाइयों की वजह से मशहूर हो चुका है। समतल और दलदल होने की वजह से यहां रोपवे जैसे किसी मार्ग की न तो जरूरत है न संभावना, न ही कोई प्रस्ताव।
चंपावत : काम नहीं कर रहे चार रोपवे
जिले में छह रोपवे (रज्जुमार्ग) हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ दो ही काम कर रहे हैं। उपराकोट से फुरकियाझाला और लोडियालसेरा से खिरद्वारी को छोड़ शेष चार रोपवे तकनीकी या दूसरे कारणों से काम नहीं कर रहे हैं। चार रोपवे खेती के उत्पादों को सड़क तक लाने के लिए प्रयुक्त किए जा रहे हैं। वहीं मां पूर्णागिरि धाम के दर्शन के लिए हनुमान चट्टी से काली मंदिर तक 903 मीटर लंबा रोपवे मंजूर है। 35 करोड़ रुपये की लागत से पीपीपी मोड पर बनने वाले रोपवे की सारी अड़चनें दूर कर ली गईं हैं। अक्तूबर से इस रोपवे के निर्माण का काम शुरू हो जाएगा।
रोप वे से नहीं जुड़ सके पिथौरागढ़ के दर्शनीय और धार्मिक स्थल
जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दर्शनीय और धार्मिक स्थलों को रोपवे से जोड़ने की घोषणाएं पूरी नहीं हो सकी हैं। वर्ष 1994 में पिथौरागढ़ नगर को पर्यटन के नक्शे पर लाने के लिए ध्वज, चंडिका मंदिर, चंडाक- मोस्टामानू तक रोप वे लगाने का प्रस्ताव बना था। वर्ष 2014 में भी मुनस्यारी से खलियाटॉप तक रोप-वे की घोषणा हुई थी। इसके बाद चंडिका मंदिर, असुरचूला और ध्वज तक रोप वे का प्रस्ताव शासन को भेजा गया लेकिन आज तक रोप वे निर्माण की दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है। केवल चुनाव के समय राजनीतिक दलों को रोप वे की याद आती है।
नैनीताल : एक रोपवे, केएमवीएन करता है इसका संचालन
नैनीताल में एकमात्र रोपवे है, जिसका संचालन कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) करता है। कोरोनाकाल में इसे अत्याधुनिक बनाया गया था। दूसरी लहर थमने के बाद इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है। इसमें सैलानी मल्लीताल से स्नोव्यू तक आवाजाही करते हैं। रानीबाग से नैनीताल के लिए भी एक और रोपवे प्रस्तावित था, लेकिन आपत्ति लगने के बाद यह खटाई में पड़ गया है।