सड़क तो बन गई लेकिन वाहन नजर नहीं आते
लान और मितड़ा गांवों के लिए सड़क बन गई है। बंदरलीमा से मितड़ा तक बनी लगभग सात किलोमीटर लंबी सड़क पर वाहन नजर नहीं आते हैं। मलान में स्कूल होने से शिक्षकों के वाहनों की आवाजाही जरूर बनी रहती है, लेकिन मितड़ा के लिए इक्का-दुक्का वाहन ही सप्ताह या माह में नजर आते हैं। गांव में जो रह गए हैं, उनके पास वाहन नहीं हैं, जो संपन्न लोग गांव से दूर शहरों में बस गए हैं, उनके पास गांव लौटने का समय नहीं है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था मलान
मलान गांव समय पर सड़क सुविधा नहीं मिलने से वीरान सा हो गया है। यह कभी कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था। 1960 से पहले काठगोदाम और टनकपुर से जो कैलाश यात्री आते थे वे पिथौरागढ़-सतगढ़-मलान-अस्कोट होते हुए पैदल तिब्बत जाते थे। उस समय कई यात्री यहां ठहरते थे। इसी रास्ते से अस्कोट के पाल राजा लाव-लश्कर के साथ घोड़े पर सवार होकर अल्मोड़ा के लिए निकलते थे। मलान में दुकानें थीं तो यहां चहल-पहल रहा करती थी। क्षेत्र का सबसे पुराना पोस्टऑफिस भी मलान में था। गुड़ौली सहित अन्य गांव जो अब नेशनल हाईवे से जुड़ने के कारण सुविधा संपन्न माने जाते है, पूर्व में वहां के लोग खरीदारी, पोस्टऑफिस आदि काम से मलान आते थे। अब मलान के बाजार में केवल एक छोटी सी दुकान है, जिसमें पूरे दिन गिने-चुने ग्राहक ही आते हैं।
खेती बंद, लहलहा रही वीरानगी की फसल
मलान, मितड़ा गांव फल उत्पादन की दृष्टि से उपयुक्त हैं। इन गांवों में आम, अमरूद, लीची, केले की अच्छी पैदावार होती है। जब लोग बेरोजगार थे तो सड़क नहीं होने से फल बाजार तक नहीं पहुंच पाते थे। अब सड़क पहुंची तो फलों की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। पहले धान, गेहूं, मडुआ, उड़द, गहत, मसूर, मटर और सब्जियों की खूब खेती होती थी लेकिन पलायन होने से यह सब बंद हो गया। खेती करने वाला कोई बचा ही नहीं। जो बुजुर्ग हैं, उनके बस की बात नहीं कि वे जंगली जानवरों से अपने खेती को बचा सकें, इसलिए वह खेती करते नहीं है। अब दोनों ही गांवों में वीरानगी की फसल लहलहा रही है।
सड़क बनने से कुछ लाभ हुआ। पहले बन जाती तो शायद यहां से इतना पलायन नहीं होता। गांव के पास तक सड़क तब आई, जब लोग यहां से शहर जा चुके है। खेती इसलिए नहीं करते है कि जानवर नुकसान पहुंचाते है। अब केवल बकरी और गाय के सहारे मेरी जिंदगी चल रही है।
-मदन मोहन पाटनी, ग्रामीण।
ये भी पढ़ें...Uttarakhand: हादसों में घायलों को मिलेगा तत्काल सटीक इलाज, आपात चिकित्सा सेवाओं के लिए ट्रामा नेटवर्क तैयार
मल्हान में बरसों से मेरी दुकान है। कई बार मन करता है कि दुकान बंद कर दूं, लेकिन यहां का नमक खाया है, इसलिए दुकान बंद नहीं कर पा रहा हूं। मलान और मितड़ा गांव में ऐसा पलायन हुआ कि दोनों ही गांव में खामोशी और वीरानगी छायी है। शाम होते ही जंगली जानवरों का खतरा सताने लगता है। यदि विकास हुआ होता तो इन दोनों ही गांवों की यह दुर्दशा न हुई होती। -ललित मोहन
गांव तक सरकार ने समय पर सड़क, अस्पताल और बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया नहीं कराई, जिसके चलते लोग गांव छोड़ धीरे-धीरे शहरों में बस गए। केवल वही लोग गांव में रह रहे हैं जिसके पास दूसरा विकल्प नहीं है। -सरस्वती देवी