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उत्तराखंड: पलायन के मर्ज से सूनी हो रही मितड़ा-मलान की कोख, न बज रही शहनाई, खामोश हो गईं बच्चों की किलकारियां

Sat, 30 Nov 2024 06:04 PM IST
रेनू सकलानी प्रेम प्रताप सिंह

सार

पलायन के मर्ज से मितड़ा और मलान की कोख सूनी हो रही है। न शादियां हो रहीं। न शहनाई बज रही। खाली होते गांवों की दर्द भरी कहानी।
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पलायन से खाली पड़ा घर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों के गांवों से पलायन एक ऐसी बीमारी का रूप लेता जा रहा है, जिसका आने वाले समय में इलाज शायद ही संभव हो। गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं। घर खंडहर हो रहे हैं। आंगन में झाड़ियां उग गईं हैं। खेत बंजर हो रहे है। न शादियां हो रही हैं और न ही शहनाई बज रही है। इससे गांव में बच्चों का जन्म नहीं हो रहा है। गांव की कोख सूनी होती जा रही है। ऐसी ही दर्द भरी कहानी है पिथौरागढ़ जिले के कनालीछीना ब्लॉक के मितड़ा और मलान गांव की। इसी पर पढ़िए अमर उजाला की पड़ताल करती हुई ग्राउंड रिपोर्ट— 

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मलान में लटके ताले बता रहे गांव की खामोश जिंदगी की कहानी 
शुरुआत मल्हान गांव से करते हैं। पिथौरागढ़-धारचूला नेशनल हाईवे से करीब 8 किलोमीटर दूर यह गांव है। यहां पहुंचने के लिए सिंगल लेन सड़क है। गांव से लगभग एक किलोमीटर पहले ही अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी। वहां से पैदल चलकर गांव तक पहुंचे। सबसे पहले गांव के प्राथमिक विद्यालय में गए। 1948 में गांव में प्राथमिक स्कूल बन गया था।

दो दशक पहले तक स्कूल में आसपास के गांवों के 200 से 250 बच्चे पढ़ते थे लेकिन अब 11 बच्चे ही हैं। पहली कक्षा में पढ़ने वाला कोई बच्चा नहीं है। ये सभी बच्चे भी केवल मल्हान के नहीं है बल्कि आसपास के गांवों के हैं। पहले गांव में 40 से 50 परिवार रहते थे लेकिन अब पांच परिवार ही रह गए हैं। गांव में एक जूनियर हाईस्कूल भी है, जिसमें बच्चों की संख्या 7 है।
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अधिकतर घरों में ताले लटके हुए हैं। देखरेख के अभाव में घर जर्जर हो रहे हैं, उनके आगे झाड़ियां उग आई हैं। पूरे इलाके में सन्नाटा पसरा हुआ है। न किसी गाड़ी की आवाज, न बच्चों का शोरगुल। गांव में खामोशी और वीरागनी पसरी हुई है। गांव में दिनेश चंद जोशी, महेश चंद जोशी, हरिराम, दीपक जोशी और पुष्कर दत्त जोशी के ही परिवार हैं, जिनमें ज्यादातर बुजुर्ग हैं। गांव में 15 साल से कम आयु का कोई बच्चा नहीं है। गांव में कई साल से शादियां नहीं हो रही हैं। 
 

शहरों में जा बसे मितड़ा के नौजवान, बुजुर्ग कर रहे पहरेदारी 
मलान गांव को देखने के बाद एक से डेढ़ किलोमीटर ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर पैदल चलकर मितड़ा गांव पहुंचे। 25 मिनट के सफर में एक व्यक्ति भी नहीं मिला। गांव में पहुंचने के बाद मदन मोहन दिखे, जो बकरी और गाय चरा रहे थे। कई बार आवाज देने पर बकरियां और गाय हकालते हुए लाए। उन्होंने पूरे गांव में घुमाया। इस गांव की खूबसूरती देखते ही बन रही है।

गांव के सामने हिमालय सौंदर्य बिखेर रहा है। गांव में केले, माल्टा, नीबू के पेड़ फलों से लदे नजर आए लेकिन इस गांव में भी कई साल से कोई शादी नहीं हुई, शहनाई नहीं बजी, क्योंकि गांव में न कोई लड़की बची है और न कोई जवान लड़का, जिसकी शादी होनी हो। एक दशक से अधिक समय से किलकारियां भी नहीं सुनाई दे रही है।

यूं कहें कि गांव में किसी बच्चे का जन्म भी नहीं हो रहा है। पूरे गांव में शून्य से लेकर 15 साल तक कोई बच्चा नहीं है। जिन लोगों के बच्चे है, उन्होंने उन्हें पढ़ने के लिए शहरों में भेज दिया है। गांव में केवल अधेड़ या बुजुर्ग ही बचे है, जो शहर नहीं जा सकते। मितड़ा में कभी 40 से 50 परिवार रहते थे लेकिन अब केवल पांच भाइयों के परिवार हैं। इनमें पार्वती देवी, ललित मोहन, मदन मोहन, जगदीश चंद्र और चंद्र बल्लभ शामिल हैं। इनकी कुल आबादी महज 15 ही बची है। 
 

सड़क तो बन गई लेकिन वाहन नजर नहीं आते 
लान और मितड़ा गांवों के लिए सड़क बन गई है। बंदरलीमा से मितड़ा तक बनी लगभग सात किलोमीटर लंबी सड़क पर वाहन नजर नहीं आते हैं। मलान में स्कूल होने से शिक्षकों के वाहनों की आवाजाही जरूर बनी रहती है, लेकिन मितड़ा के लिए इक्का-दुक्का वाहन ही सप्ताह या माह में नजर आते हैं। गांव में जो रह गए हैं, उनके पास वाहन नहीं हैं, जो संपन्न लोग गांव से दूर शहरों में बस गए हैं, उनके पास गांव लौटने का समय नहीं है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था मलान 
मलान गांव समय पर सड़क सुविधा नहीं मिलने से वीरान सा हो गया है। यह कभी कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था। 1960 से पहले काठगोदाम और टनकपुर से जो कैलाश यात्री आते थे वे पिथौरागढ़-सतगढ़-मलान-अस्कोट होते हुए पैदल तिब्बत जाते थे। उस समय कई यात्री यहां ठहरते थे। इसी रास्ते से अस्कोट के पाल राजा लाव-लश्कर के साथ घोड़े पर सवार होकर अल्मोड़ा के लिए निकलते थे। मलान में दुकानें थीं तो यहां चहल-पहल रहा करती थी। क्षेत्र का सबसे पुराना पोस्टऑफिस भी मलान में था। गुड़ौली सहित अन्य गांव जो अब नेशनल हाईवे से जुड़ने के कारण सुविधा संपन्न माने जाते है, पूर्व में वहां के लोग खरीदारी, पोस्टऑफिस आदि काम से मलान आते थे। अब मलान के बाजार में केवल एक छोटी सी दुकान है, जिसमें पूरे दिन गिने-चुने ग्राहक ही आते हैं।

छात्र रोज नापते थे आठ से 16 किलोमीटर की पैदल दूरी 
शासन-प्रशासन की उपेक्षा के कारण पलायन की मार झेल रहे मलान व मितड़ा गांव के लोगों ने बड़ा संघर्ष झेला है। मलान में पहले केवल एक प्राथमिक विद्यालय हुआ करता था। पांचवीं कक्षा पास करने के बाद यहां के छात्र-छात्राओं को आठवीं के लिए चार किमी दूर गुड़ौली और हाईस्कूल, इंटर के लिए आठ किमी दूर कनालीछीना जाना पड़ता था। इन संघर्षों के बावजूद यहां के छात्रों ने अच्छे पदों पर नौकरियां पाईं। मलान गांव के अशोक जोशी वर्तमान में अपर जिलाधिकारी हैं। नवीन जोशी, जेपी जोशी सहित तमाम अन्य युवाओं ने इंजीनियरिंग में अच्छा मुकाम हासिल किया। मितड़ा के ओम प्रकाश पाटनी विदेश में चिकित्सा विशेषज्ञ हैं। इसके अलावा, गांव के कई युवा इंजीनियर, शिक्षक सहित अन्य पदों पर कार्यरत हैं। मलान गांव के सेवानिवृत शिक्षक पुष्कर दत्त जोशी कहते हैं कि यदि समय पर गांव तक सड़क पहुंच जाती तो पलायन से इस तरह गांव खाली नहीं होते। वह कहते हैं कि गांव सड़क से जुड़ गए हैं तो आने वाले समय में कुछ लोग जरूर गांवों की ओर लौटेंगे।
 
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खेती बंद, लहलहा रही वीरानगी की फसल 
मलान, मितड़ा गांव फल उत्पादन की दृष्टि से उपयुक्त हैं। इन गांवों में आम, अमरूद, लीची, केले की अच्छी पैदावार होती है। जब लोग बेरोजगार थे तो सड़क नहीं होने से फल बाजार तक नहीं पहुंच पाते थे। अब सड़क पहुंची तो फलों की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। पहले धान, गेहूं, मडुआ, उड़द, गहत, मसूर, मटर और सब्जियों की खूब खेती होती थी लेकिन पलायन होने से यह सब बंद हो गया। खेती करने वाला कोई बचा ही नहीं। जो बुजुर्ग हैं, उनके बस की बात नहीं कि वे जंगली जानवरों से अपने खेती को बचा सकें, इसलिए वह खेती करते नहीं है। अब दोनों ही गांवों में वीरानगी की फसल लहलहा रही है। 

सड़क बनने से कुछ लाभ हुआ। पहले बन जाती तो शायद यहां से इतना पलायन नहीं होता। गांव के पास तक सड़क तब आई, जब लोग यहां से शहर जा चुके है। खेती इसलिए नहीं करते है कि जानवर नुकसान पहुंचाते है। अब केवल बकरी और गाय के सहारे मेरी जिंदगी चल रही है। -मदन मोहन पाटनी, ग्रामीण। 

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मल्हान में बरसों से मेरी दुकान है। कई बार मन करता है कि दुकान बंद कर दूं, लेकिन यहां का नमक खाया है, इसलिए दुकान बंद नहीं कर पा रहा हूं। मलान और मितड़ा गांव में ऐसा पलायन हुआ कि दोनों ही गांव में खामोशी और वीरानगी छायी है। शाम होते ही जंगली जानवरों का खतरा सताने लगता है। यदि विकास हुआ होता तो इन दोनों ही गांवों की यह दुर्दशा न हुई होती। -ललित मोहन 

गांव तक सरकार ने समय पर सड़क, अस्पताल और बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया नहीं कराई, जिसके चलते लोग गांव छोड़ धीरे-धीरे शहरों में बस गए। केवल वही लोग गांव में रह रहे हैं जिसके पास दूसरा विकल्प नहीं है। -सरस्वती देवी
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