इसी दौरान लॉकडाउन की आहट मिलने लगी। लिहाजा सुबह 11.30 बजे तीनों वहां से निकल पड़े। बुजुर्ग का कहना है कि यही दो घंटे मरकज में गुजारना उनके लिए खतरनाक साबित हुआ और वे कोरोना की चपेट में आ गए। उन्होंने कहा कि कोरोना से तो उन्हें ज्यादा तकलीफ नहीं, लेकिन इस बात का पूरी जिंदगी गम रहेगा कि उनकी वजह से पूरे गांव को कितनी तकलीफें झेलनी पड़ रही हैं।
22 बीघा सब्जी की खेती हो जाएगी बेकार
कोरोना पीड़ित बुजुर्ग ने बताया कि उनके परिवार के आठ लोग क्वारंटीन हैं। उन्होंने 22 बीघा जमीन में सब्जी की खेती की हुई है। इसमें छह बीघा जमीन उनकी खुद की है जबकि 16 बीघा जमीन किराए पर लेकर सब्जी उगाई थी। अब इसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है।