उत्तराखंड राज्य गठन के 14 साल बाद भी गढ़वाली, कुमाऊंनी एवं अन्य स्थानीय भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हो पाई हैं।
75 लाख से अधिक लोग गढ़वाली और कुमाऊंनी बोलते हैं। इसके बावजूद न तो इसे आठवीं अनुसूची में स्थान मिल पाया है और न ही संरक्षण और संवर्धन के लिए लोकभाषा अकादमी की स्थापना हो पाई है।
बद्रीपुर जोगीवाला में उत्तराखंड की लोक भाषाओं पर संकट विषय पर आयोजित संगोष्ठी में भी प्रदेश के विभिन्न लोक कलाकारों और साहित्यकारों ने इस स्थिति पर चिंता जताई। लोक गायक नरेंद्र नेगी ने कहा कि हम अपनी पहचान खो रहे हैं। बोली और भाषा ही नहीं रहेगी तो लोक गीत भी समाप्त हो जाएंगे।
गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा उत्तराखंड में प्राचीनकाल से बोली जाती है, गढ़वाली गढ़राजाओं एवं कुमाऊंनी भाषा चंद शासन काल (1560-1790 ई.) में यहां की राजभाषा रही है। उत्तराखंड भाषा संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक उस दौरान सभी शासकीय कार्य गढ़वाली एवं कुमाऊंनी में होते थे।
सके तत्कालीन ताम्रपत्रों, शिलालेखों एवं सरकारी दस्तावेजों में सैकड़ों अभिलेखीय प्रमाण आज भी मौजूद हैं। उत्तराखंड के अलावा देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में गढ़वाली और कुमाऊंनी पर कई शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं।
जर्मन के प्रोफेसर माइजनर ने तो कुमाऊंनी की प्रसिद्ध लोक गाथा राजुला मालूशाही को तीन खंडों में जर्मनी में प्रकाशित किया है, लेकिन उत्तराखंड में ही इन बोली, भाषाओं की सबसे अधिक अनदेखी हुई है। स्थिति यह है कि प्रदेश में अन्य भाषाओं की भाषा अकादमी खोली गई है, लेकिन गढ़वाली, कुमाऊंनी के संरक्षण, संवर्धन के लिए लोक भाषा अकादमी की स्थापना नहीं हो पाई है।
लोक कलाकारों और साहित्यकारों का कहना है कि प्रदेश की बोली भाषाओं के संरक्षण के लिए हमें राज्य आंदोलन की तरह एक और आंदोलन की आवश्यकता है। जब तक भाषायी आंदोलन खड़ा नहीं होगा, कुछ होने वाला नही है।
भाषाओं को लेकर हमारे नेताओं में हीन भावना है, उन्हें केवल चुनाव के समय इसकी याद आती है, वोट के लिए वह क्षेत्र में जागकर भूली-भैजी बोलते हैं और फिर भूल जाते हैं।
- नरेंद्र सिंह नेगी, लोक गायक
संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं, वर्षों से यह शासन-प्रशासन चलाने की भाषा रही है, इसके बावजूद इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जा सका है।
- नंद्र किशोर हटवाल, साहित्यकार