उत्तराखंड सूचना आयोग ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि असली विषय सूचना पाना नहीं है। आरटीआई का असली उद्देश्य श्रम विभाग में हुई उस अनियमितता को सामने लाना है जिसमें कथित तौर पर फर्जी हस्ताक्षर कर एक संस्थान को नोटिस जारी किया गया है। आयोग ने मामले की जांच के लिए अपने आदेश की प्रति श्रम विभाग के उच्च अधिकारियों को भेजने का निर्देश दिया है।
दरअसल, सुरेश चंद्र आर्य ने श्रम विभाग के एक कार्यालय में आरटीआई दाखिल कर उन दस्तावेजों की मांग की थी जिन पर उनके कथित फर्जी हस्ताक्षर कर मेट्रो हॉस्पिटल एवं हार्ट इंस्टीट्यूट सिडकुल से कर बकाए की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों से यह स्पष्ट हुआ है कि अधिकारी के हस्ताक्षर पर जारी नोटिस पर अस्पताल से 21,85,251 रुपये का कर प्राप्त किया जा चुका है।
सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की
अस्पताल पर अब भी 9,88,970 रुपये का कर बकाया होने की बात कही गई है जिसकी वसूली के लिए विभागीय कार्रवाई चल रही है। वहीं, अधिकारी द्वारा आयोग के सामने उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों और तर्कों से स्पष्ट हुआ है कि उक्त नोटिस पर अंकित हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। विभाग से आरटीआई में सही सूचना न मिलने पर उन्होंने पहले विभागीय अपील दायर की थी। विभागीय आदेश के बाद भी उचित जवाब न मिलने पर उन्होंने सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की थी।
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आयुक्त दलीप सिंह आर्य ने सुनवाई करते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि मामला सूचना पाने का नहीं, बल्कि विभागीय अनिमितता को सामने लाने का है। उन्होंने सुरेश चंद्र आर्य को उपयुक्त जांच विकल्प पाने की सलाह देते हुए आदेश की प्रति उच्च अधिकारियों को भेजने का निर्देश दिया जिससे मामले का सच सामने आ सके।