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उत्तराखंड: उच्च शिक्षा आयोग का होगा गठन, वार्षिक परीक्षाओं में फिर लागू होगा सेमेस्टर सिस्टम    

Tue, 18 Aug 2020 12:55 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

  • उच्च शिक्षा राज्यमंत्री की अध्यक्षता में सचिवालय में हुई बैठक में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रस्तुतीकरण किया गया 
  • उच्च शिक्षा सलाहकार की अध्यक्षता में कमेटी गठित, 40 दिन में देगी सुझाव 
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- फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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उत्तराखंड में उच्च शिक्षा आयोग का गठन किया जाएगा। साथ ही वार्षिक परीक्षा प्रणाली को खत्म कर सेमेस्टर सिस्टम को फिर से लागू किया जाएगा। सोमवार को सचिवालय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर चर्चा के दौरान इस पर सहमति बनी। 

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उच्च शिक्षा राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत की अध्यक्षता में सचिवालय स्थित सभागार में हुई बैठक में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रस्तुतीकरण किया गया। जिसमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विस्तृत अध्ययन के लिए गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं उच्च शिक्षा सलाहकार प्रोफेसर एमएसएम रावत की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई। जो 40 दिन में अपने सुझाव देगी।


नई शिक्षा नीति पर चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने अपनी राय भी रखी। जिनमें प्रमुख रूप से राज्य शिक्षा आयोग के गठन, राज्य के कई महाविद्यालयों को विश्वविद्यालय व स्वायत्तशासी महाविद्यालय बनाए जाने, बहुविषय विश्वविद्यालय की स्थापना, कोर्स स्ट्रक्चर तैयार किए जाने, वार्षिक परीक्षा प्रणाली खत्म कर सेमेस्टर सिस्टम को शुरू कर क्रेडिट बेस्ड सिस्टम लागू करने, प्रत्येक जिले में समावेशी महाविद्यालय बनाए जाने पर सहमति बनी। 

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बैठक में निर्णय लिया गया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर विस्तृत अध्ययन के लिए जो कमेटी गठित की गई है। उसमें राज्य के समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपति, निदेशक उच्च शिक्षा, उपाध्यक्ष उच्च शिक्षा, उन्नयन समिति व शासन स्तर के अधिकारी बतौर सदस्य शामिल रहेंगे। 

चर्चा के दौरान उच्च शिक्षा विशेषज्ञों की ओर से यह भी बताया गया कि बहुविषयक शिक्षा के प्रावधान के तहत स्नातक तीन या चार वर्ष की अवधि की होगी। जिसमें छात्रों को किसी भी विषय या क्षेत्र में एक साल पूरा करने पर प्रमाणपत्र, दो साल पूरा करने पर डिप्लोमा, तीन वर्ष की अवधि के बाद स्नातक की डिग्री प्रदान की जाएगी। जबकि चार वर्ष के कार्यक्रम में शोध सहित डिग्री प्रदान की जाएगी। पीएचडी के लिए या तो स्नातकोत्तर डिग्री या शोध के साथ चार वर्ष की स्नातक डिग्री अनिवार्य होगी। 

इसके अलावा नई शिक्षा नीति के तहत तीन प्रकार के शिक्षण संस्थान होंगे। जिसमें अनुसंधान विश्वविद्यालय, शिक्षण अनुसंधान, स्वायत्त महाविद्यालय शामिल हैं। इसमें एफिलेटिंग विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों का कंसेप्ट समाप्त हो जाएगा। 
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