जिसके बाद सरकार ने अध्यादेश पारित कर पूर्व मुख्यमंत्रियों को राहत देते हुए अध्यादेश को विधानसभा में पारित कराकर अधिनियम की शक्ल दे दी। अधिनियम में कहा गया था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों से सुविधाओं के एवज में मानक किराए से 25 फीसदी अधिक किराया वसूला जाएगा।
यह भी कहा था कि मानक किराया सरकार तय करेगी। सरकार का कहना था कि पूर्व मुख्यमंत्री बिजली, पानी, सीवरेज, सरकारी आवास आदि का बकाया खुद वहन करेंगे मगर किराया सरकार तय करेगी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि अधिनियम पूरी तरह असांवधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार का उल्लंघन है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निर्णय सुरक्षित रख लिया।