याचिका में कहा गया था कि उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड को ऐसा आदेश पारित करने का कोई अधिकार नही है। जैव विविधता बोर्ड अधिनियम भारतीय कंपनियों पर लागू नही होता है।
पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 21 दिसंबर को फैसला सुनाया था। याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जैविक संसाधन राष्ट्र की संपत्ति है लेकिन यह उन स्वदेशी व स्थानीय समुदायो की भी संपत्ति है जिन्होंने इसे सदियो से संरक्षित रखा है।
कोर्ट ने कहा कि उत्तराखंड में उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले समुदाय अपने जैविक संसाधन के पारंपरिक हकदार है वे ना केवल इसे संरक्षित रखते है बल्कि उसकी जानकारी वे पीढ़ी दर पीढ़ी समाहित रखते है।