याचिका में कहा गया कि इन कंपनियों को शर्तों पर डंपिंग जोन आवंटित किए गए थे, लेकिन स्थानीय प्रशासन से साठगांठ कर मलबे को आवंटित जोनों में डालने की बजाय नदियों और राष्ट्रीय राजमार्ग-58 के किनारे फेंका जा रहा है, जहां अब तक करोड़ों टन मलबा निस्तारित किया जा चुका है। याचिका में कहा गया कि कई डंपिंग जोन 2013 की आपदा में बह गए थे और कंपनियों ने दूसरे जोन निर्धारित नहीं किए।
याची के अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता ने कोर्ट में कहा कि भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 2013 की आपदा की जांच रिपोर्ट में माना है कि इस दौरान नदियों में भारी उफान और उनका रास्ता बदल जाने का मुख्य कारण इनके किनारों पर मलबे का अनुचित निस्तारण था और नदियों के अचानक प्रवाह बदल लेने से भारी जनहानि और संपत्ति को नुकसान हुआ था। याचिका में निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं को प्रतिबंधित करने, डंपिंग जोन निर्धारित करने और पूर्व में हुई जन-धन की हानि का मुआवजा दिलवाने की मांग की गई थी।
पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि मंदाकिनी और अलकनंदा गंगा नदी की प्रमुख सहायक नदियां हैं। गंगा नदी पहले ही सिकुड़ रही है, ऐसे में इनसे छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अत: पोषणीय और संतुलित विकास के लिए इनको सुरक्षित रखा जाना आवश्यक है।