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हाथ नहीं थे तो भीख मांगकर करती थी गुजारा, अब पैरों से पेंटिंग बनाकर देश के लिए बन गई नजीर

Mon, 11 Jun 2018 01:04 PM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, ऋषिकेश
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anjana mali
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ये कहानी है अंजना माली की। जिन्होंने हालातों से हार नहीं मानी और आज सबके लिए नजीर बन गई हैं। जानिए अंजना की कहानी खुद उनकी जुबानी...

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अंजना कहती हैं कि मैंने पेंटिंग बनाने का काम शुरू कर दिया था, लेकिन भीख मांगना नहीं छोड़ा था, क्योंकि बिना हाथों के मैं कोई दूसरा काम नहीं कर सकती थी, जिसकी कमाई से पेंटिंग के लिए जरूरी रंग और ब्रश खरीद सकूं। मैं ऋषिकेश में रहती हूं और एक गरीब परिवार से हूं। जन्म से ही मेरे दोनों हाथ नहीं हैं और शरीर के दूसरे अंगों में भी दिक्कतें हैं। इतने सारे कुदरती अन्याय के बावजूद मैं पैरों से पेंटिंग बनाकर अपने परिवार का खर्च चलाती हूं। मगर मेरी जिंदगी हमेशा से ऐसी नहीं रही है। मैंने लंबे वक्त तक गंगा घाटों पर सैलानियों से भीख मांगी है।

पिछले साल की बात है, मैं घाट पर बैठी हुई थी। उस दिन मैं पहली दफा अपने पैरों से चारकोल का एक टुकड़ा पकड़कर कुछ लिखना चाह रही थी। दरअसल मैं अपने पैरों से फर्श पर भगवान राम का नाम लिखना चाह रही थी। मुझे दिक्कत हो रही थी, लेकिन मैं लगातार कोशिश कर रही थी। मेरी कोशिशों पर एक अमेरिकी कलाकार और योग प्रशिक्षक की नजरें बड़े ध्यान से गड़ी हुई थीं। उसने न सिर्फ मेरी मदद की, बल्कि बाद में उसी अमेरिकी ने मुझे पैरों से पेंटिंग बनाना सिखा दिया।
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स्टीफेनी (वह अमेरिकी) पहली शख्स थीं, जिन्होंने कला के प्रति मेरे जुनून को पहचाना। इसके लिए मैं हमेशा उनकी शुक्रगुजार रहूंगी। हालांकि मेरे लिए यह काम इतना आसान नहीं रहा, क्योंकि न सिर्फ हाथ, बल्कि मेरे कमर में भी कुछ कुदरती दिक्कत है, जिससे मैं झुककर चलती हूं। लेकिन कठिन मेहनत के दम पर मैंने यह कौशल चंद महीनों में हासिल कर लिया। अनवरत अभ्यास के दम पर मैंने बिना हाथों के विभिन्न देवताओं की पेंटिंग बनानी सीख ली। मोर और दूसरे पक्षियों के जटिल चित्र भी मैं आसानी से बनाने लगी।
 

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anjana mali
मेरी पेंटिंग अच्छे दामों में बिकने लगीं, नतीजा यह निकला कि बहुत जल्द मैंने भीख मांगना छोड़ दिया। मुझे अपनी हर पेंटिंग के दो से तीन हजार रुपये मिल जाते हैं। मेरी अधिकतर पेंटिंग विदेशी ही खरीदते हैं। आज मैं अपनी कमाई से अपने माता-पिता की आर्थिक मदद कर सकती हूं। चूंकि मेरे परिवार का एक और सदस्य शारीरिक रूप से अक्षम है, ऐसे में मेरी जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं। पेंटिंग बनाने के लिए मैं गंगा घाट पर बैठकर प्रकृति को निहारते हुए अपनी कल्पनाओं को उड़ान देती हूं। अक्सर काम करते हुए मेरे आसपास भीड़ इकट्ठा हो जाती है। लोगों को मेरा काम चकित करता है। लेकिन मुझे समझ में आ गया है कि हाथ हों या पांव, अभ्यास ही उन्हें उपयोगी बनाता है।

मैंने बहुतों को हाथों का दुरुपयोग करते हुए देखा है। मेरे साथ अच्छी बात यह है कि मैं चाहकर भी अपने हाथों का दुरुपयोग कभी नहीं कर सकती! वैसे तो मैं पैरों से पेंटिंग बनाना सीख गई हूं, लेकिन मैं यहीं रुकना नहीं चाहती। मैं चाहती हूं कि कला की बारीकियों को और बेहतर तरीके से समझूं, ताकि अपनी अधूरी जिंदगी को अपनी उपलब्धियों से पूरी कर सकूं। मैं यह भी चाहती हूं कि मैं देश के प्रधानमंत्री मोदी को भी अपनी एक पेंटिंग उपहार स्वरूप दूं। अपने अनुभवों के आधार पर मेरा मानना है कि जिंदगी चुनौतियों का ही नाम है। मायने यह रखता है कि हम इन चुनौतियों का सामना किस तरह करते हैं। ऐसा नहीं है कि मेरा संघर्ष खत्म हो गया है, लेकिन निश्चित रूप से मैंने संघर्ष का एक पड़ाव सफलतापूर्वक पार कर लिया है।
 
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