मेरी पेंटिंग अच्छे दामों में बिकने लगीं, नतीजा यह निकला कि बहुत जल्द मैंने भीख मांगना छोड़ दिया। मुझे अपनी हर पेंटिंग के दो से तीन हजार रुपये मिल जाते हैं। मेरी अधिकतर पेंटिंग विदेशी ही खरीदते हैं। आज मैं अपनी कमाई से अपने माता-पिता की आर्थिक मदद कर सकती हूं। चूंकि मेरे परिवार का एक और सदस्य शारीरिक रूप से अक्षम है, ऐसे में मेरी जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं। पेंटिंग बनाने के लिए मैं गंगा घाट पर बैठकर प्रकृति को निहारते हुए अपनी कल्पनाओं को उड़ान देती हूं। अक्सर काम करते हुए मेरे आसपास भीड़ इकट्ठा हो जाती है। लोगों को मेरा काम चकित करता है। लेकिन मुझे समझ में आ गया है कि हाथ हों या पांव, अभ्यास ही उन्हें उपयोगी बनाता है।
मैंने बहुतों को हाथों का दुरुपयोग करते हुए देखा है। मेरे साथ अच्छी बात यह है कि मैं चाहकर भी अपने हाथों का दुरुपयोग कभी नहीं कर सकती! वैसे तो मैं पैरों से पेंटिंग बनाना सीख गई हूं, लेकिन मैं यहीं रुकना नहीं चाहती। मैं चाहती हूं कि कला की बारीकियों को और बेहतर तरीके से समझूं, ताकि अपनी अधूरी जिंदगी को अपनी उपलब्धियों से पूरी कर सकूं। मैं यह भी चाहती हूं कि मैं देश के प्रधानमंत्री मोदी को भी अपनी एक पेंटिंग उपहार स्वरूप दूं। अपने अनुभवों के आधार पर मेरा मानना है कि जिंदगी चुनौतियों का ही नाम है। मायने यह रखता है कि हम इन चुनौतियों का सामना किस तरह करते हैं। ऐसा नहीं है कि मेरा संघर्ष खत्म हो गया है, लेकिन निश्चित रूप से मैंने संघर्ष का एक पड़ाव सफलतापूर्वक पार कर लिया है।