बता दें कि बागेश्वर जिले के गरुड़ निवासी अधिवक्ता डीके जोशी ने इस मामले में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि प्रदेश में सरकारी संरक्षण में बेची जा रही शराब से जनजीवन प्रभावित हो रहा है। कई घर उजड़ गए हैं। इससे होने वाली बीमारी और दुर्घटना से हताहत होने वालों के लिए कोई मुआवजे की व्यवस्था भी नहीं की गई है।
प्रदेश में लागू आबकारी अधिनियम 1910 में उप्र सरकार ने 1978 में 37 ए के माध्यम से संशोधन किया था, लेकिन उत्तराखंड सरकार इस संशोधन का पालन नहीं कर रही है। वहीं साल दर साल राज्य सरकार राजस्व के नाम पर दुकानों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज कर रही है। 2019 की आबकारी नीति में डीएम के लिए विशेष निर्देश हैं कि जिले का कोई भी क्षेत्र शराब की दुकान से वंचित नहीं रहे।
21 साल से कम के व्यक्ति को शराब नहीं बेचने के प्रावधान की भी उपेक्षा की जा रही है। याचिका में पहाड़ी प्रदेश में बर्बादी का कारण बताते हुए यहां शराब पर प्रतिबंध लगाने के आदेश पारित करने की मांग की गई थी।
याचिका पर राज्य सरकार की ओर से विरोध में याचिका दायर की गई। इसमें कहा गया कि वर्ष 2002 में आबकारी पालिसी में कई प्रतिबंध लगाए गए हैं। प्रदेश के धार्मिक स्थल हरिद्वार, ऋषिकेश, चारधाम, पूर्णागिरी व पिरान कलियर क्षेत्र में शराब को प्रतिबंधित किया गया है।
स्कूल कॉलेज और मंदिर मस्जिद से भी दूरी बनाए रखी गई है। इसको देखते हुए याचिका विचारणीय नहीं है। याची की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी नौटियाल ने बताया कि संयुक्त खंडपीठ ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए सरकार को 37 ए के प्रावधान लागू करने के लिए नीति बनाने को छह माह का समय दिया है। इसके बाद इसका पालन सुनिश्चित करने को कहा है।