2022 में कोर्ट ने इसे निरस्त किया था
राज्य सरकार की ओर से खनन नीति में किए गए इस संशोधन को उच्च न्यायालय ने गलत मानते हुए सितंबर 2022 में निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट ने इसे टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के समान ही प्राकृतिक संसाधनों का अवैध दोहन माना। रॉयल्टी की दर में किए गए इस भारी अंतर को भी अवैध माना।
2000 करोड़ से अधिक के राजस्व की हानि
जनहित याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि राज्य को नैनीताल जिले से ही कुल 419 करोड़ रुपए से अधिक के राजस्व की हानि हुई है। इसी तरह हरिद्वार जिले में लगभग 91 करोड़ रुपए की राजस्व हानि हुई है। अनुमान है की खनन नीति में हुए इस संशोधन के कारण उत्तराखंड को 1500 से 2000 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व की हानि हुई है। इतनी बड़ी राजस्व हानि स्पष्ट रूप से एक बड़ा घोटाला है क्योंकि खनन नीति में यह संशोधन तत्कालीन सरकार के शीर्ष स्तर ने किया था।
इसलिए हजारों करोड़ रुपये के इस घोटाले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच राज्य की जांच एजेंसी से कराया जाना संभव नहीं है। जनहित याचिका में कोर्ट से न्यायालय की निगरानी में सीबीआई से इस मामले की जांच कराने की मांग की गई। दोषी नेताओं व अधिकारियों से राजकोष को हुए नुकसान की भरपाई के साथ उनपर मुकदमा चलाने की मांग की गई।