बता दें कि वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट के सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि सरकार पदोन्नति में आरक्षण तब दे जब वह आंकड़े जुटा ले कि किस जाति के कितने लोग वंचित हैं। वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व कितना है और कितने पद रिक्त हैं। इसके बाद भी पदोन्नति में आरक्षण जारी रहने पर मामला पुन: कोर्ट पहुंचा था। तब कोर्ट ने 2011 में 1994 का यूपी का आरक्षण संबंधी एक्ट निरस्त कर दिया था।
बाद में ज्ञानचंद प्रकरण में हाईकोर्ट ने आरक्षण दिए जाने को कहा था, जिसमें सरकार ने रिव्यू पिटिशन डाली थी। इस पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश की तर्ज पर चार माह में आंकड़े जुटाकर निर्णय लेने को कहा था।
इसी क्रम में हाईकोर्ट ने अन्य संबंधित याचिकाओं पर भी ज्ञानचंद मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार ही तथ्य जुटाकर कार्रवाई करने को कहा है। इस निर्णय के बाद अब सरकार इस मामले में निर्णय लेने को स्वतंत्र हो गई है। हांलाकि सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले में 10 दिसंबर को सुनवाई होनी है।