नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड में गंगा पर स्थापित जल विद्युत एवं सिंचाई परियोजनाओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को जल शक्ति मंत्रालय को प्रत्यावेदन देने और जल शक्ति मंत्रालय को तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन को निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। सामाजिक कार्यकर्ता भरत झुनझुनवाला ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि जल शक्ति मंत्रालय ने वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी की तमाम रिपोर्टों को दरकिनार करते हुए पर्यावरण प्रभाव की मात्रा को निर्धारित कर लिया है।
याचिका में कहा कि सिंचाई परियोजनाओं से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा निर्धारित करने में कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं लिया गया। इन परियोजनाओं से लगभग 50 फीसदी पानी छोड़ने की बात कही गई थी ताकि गंगा में मछलियां जीवित रह सकें और गंगा की सांस्कृतिक अस्मिता बनी रहे लेकिन जल शक्ति मंत्रालय ने केवल 20 से 30 प्रतिशत पानी छोड़ने की अधिसूचना जारी की।
इस मात्रा को निर्धारित करने में जल शक्ति मंत्रालय ने सेंट्रल वाटर कमीशन की एक रिपोर्ट को आधार बनाया था लेकिन सेंट्रल वाटर कमीशन की उस रिपोर्ट को तैयार करने वाले दो सदस्य एके गुसाईं और शरद जैन पहले ही 50 प्रतिशत पानी छोड़ने की बात कह चुके थे, इसलिए यह रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं कही जा सकती। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह जल शक्ति मंत्रालय को प्रत्यावेदन दे। वहीं कोर्ट ने जल शक्ति मंत्रालय को तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन को निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं।