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एक साल के कार्यकाल में अफसरशाही के कामकाज से संतुष्ट नहीं राज्यपाल बेबी रानी, पढ़ें खास रिपोर्ट

Mon, 26 Aug 2019 08:20 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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राज्यपाल बेबी रानी मौर्य - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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राज्यपाल बेबी रानी मौर्य त्रिवेंद्र सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों से संतुष्ट हैं, लेकिन इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इन्हें धरातल पर कैसे उतारा जाएगा? दरअसल, उन्हें अफसरशाही के काम करने का तरीका पसंद नहीं आ रहा। वे चाहती हैं कि नौकरशाही अपना सौ फीसदी दे।

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वे राज्य में उच्च शिक्षा के स्तर में और अधिक सुधार लाने पर जोर दे रही हैं। इसके लिए वे राजभवन स्तर पर ऐसे प्रयास कर रही हैं कि सभी विश्वविद्यालय एक अंब्रेला एक्ट के तहत संचालित हों। महिलाएं और बच्चे उनके एजेंडे में सबसे ऊपर हैं।

अमर उजाला ने उनसे ऐसे कई अन्य ज्वलंत मसलों पर बातचीत की। राज्यपाल ने अमर उजाला के राज्य ब्यूरो प्रमुख अरुणेश पठानिया के इन मसलों से जुड़े हर सवाल का बड़ी बेबाकी के साथ जवाब दिया। इस दौरान अपने एक साल के कार्यकाल के अनुभवों को उन्होंने बेहद सहजता के साथ साझा किया। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश:-

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उत्तराखंड में राज्यपाल के तौर पर कार्यकाल का पहला वर्ष किन अनुभवों के साथ गुजरा? 

पदभार ग्रहण करने के साथ ही मैंने राज्यपाल के लिए महामहिम का संबोधन समाप्त किया। मेरा मानना है कि यह एक शब्द राज्यपाल को जनता से जुड़ने से रोकता है। चूंकि उत्तराखंड मेरे लिए नया राज्य था, तो मुझे लगभग छह माह प्रदेश को समझने में लगे। मेरी कोशिश रही कि हर क्षेत्र के लोगों से अधिक से अधिक मिलूं। पहाड़ी क्षेत्रों का दौरा किया। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों से मुलाकात की, उनके सशक्तीकरण को लेकर प्रयास शुरू किए। स्वयं महिला हूं तो मेरा फोकस महिला और बच्चों पर अधिक है। उनकी हेल्थ और सुरक्षा पर कुछ करने की सोच रहे हैं।

किन कोर सेक्टर पर आपका फोकस रहा ?
महिलाओं को फोकस में रखकर काम कर रही हूं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि महिलाओं के स्वरोजगार को प्रोत्साहित कर पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। मैंने जनपदों का दौरा कर उनकी समस्याओं को जाना। महिलाओं को सशक्त करने के लिए आंगनबाड़ी से उद्यमिता तक हमें ध्यान देना होगा। उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य सबसे महत्वपूर्ण है, इसके बाद उनको उद्यमिता से जोड़कर आर्थिक रूप से सशक्त करना होगा। सरकार की ओर से कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन उनको ठीक तरह से धरातल पर उतारना है। अमल करना अधिकारियों के हाथ में है। इसके साथ बच्चों को नशे की लत से दूर रखना है। उन्हें किस तरह इससे दूर रखा जाए। उनकी काउंसलिंग करवाई जाए, इस क्षेत्र में काम किया जा रहा है।

सरकार की संवैधानिक हेड होने के नाते कामकाज को कैसे आंकती हैं? 

यह मुख्यमंत्री का कार्यक्षेत्र है कि सरकार बेहतर तरीके से संचालित हो। शासन चलाना उनका अधिकार क्षेत्र है। हमारा काम केवल मानिटरिंग का है। अगर मेरी बात करें तो सरकार ठीक काम कर रही है। कई बार मैं सुझाव भी देती हूं। हालांकि सरकारी मशीनरी का कामकाज जितना संतोषजनक होना चाहिए उतना नहीं है। अधिकारियों को ठीक काम करना चाहिए। मैं अफसरों के काम से 100 प्रतिशत संतुष्ट नहीं हूं। इसमें मुख्यमंत्री का रोल उतना नहीं है। जनहित में सरकार योजनाएं लाती है, उसे समयबद्ध तरीके से पूरा करने का जिम्मा अधिकारियों का है, उनको ठीक से काम करना चाहिए।

आपके कार्यकाल में ऐसे मौके आ चुके हैं जब सरकार न्यायालय के आदेश के खिलाफ अध्यादेश लाई है, यह कितना सही है? 
सरकार को जनहित ध्यान में रखकर निर्णय लेने होते हैं। जनहित सर्वोपरि है। अतिक्रमण हटाने  के आदेश से मलिन बस्तियों को बाहर करने के लिए अध्यादेश सोच समझ कर लाया गया है। उसके सभी पहलुओं पर राजभवन के स्तर से विचार हुआ। राजभवन ने विधिक राय भी ली। बड़ी संख्या में हजारों की संख्या में लोगों को तत्काल विस्थापित करना आसान नहीं होता। पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधाओं को लेकर लाए अध्यादेश पर राज भवन उसके सभी पहलुओं का परीक्षण कर रहा है। जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम में संशोधन के लिए लाया गया अध्यादेश परीक्षण के स्तर पर है।

किन सेक्टर में आपको उत्तराखंड का बेहतर भविष्य दिखता है?

प्रदेश सरकार ने बीते वर्ष इन्वेस्टर समिट का आयोजन कर निवेश और रोजगार की नींव रख दी है। मेरा मानना है कि सबसे अहम सेक्टर पर्यटन है, जिसमें बहुत कुछ करने की संभावना है। उत्तराखंड देवभूमि है। यहां चारधाम, पिरानकलियर, नानकमत्ता और हेमकुंड साहिब जैसे बड़े धार्मिक आस्था के स्थल हैं। विशाल हिमालय है, जिसमें पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। इससे प्रदेश की आर्थिकी बदल सकती है। हर्बल खेती के सेक्टर में और मजबूती से काम करना है। योग, ध्यान और वैदिक शिक्षा के क्षेत्र में उत्तराखंड नए आयाम स्थापित कर सकता है। महिला और बच्चों के लिए मेरी प्राथमिकताएं हैं, इस दिशा में और काम किया जाएगा। पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर महिलाएं आगे बढ़ें, तभी सही मायनों में विकास होगा।

कुलपतियों की नियुक्ति में अब तक रही तदर्थ व्यवस्था रोकने के लिए क्या कदम उठाए?
किसी भी प्रदेश के युवाओं को आगे बढ़ाने में वहां के विश्वविद्यालय अहम होते हैं। मेरे से पहले क्या व्यवस्था रही, मैं उसमें नहीं जाऊंगी। हां! राजभवन के स्तर से अपने विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक कार्यों में गुणवत्ता लाने के लिए बेहद गंभीरता से कार्य किया। विश्वविद्यालयों में स्थायी कुलपतियों की तैनाती को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। छह विश्वविद्यालयों में नियमित कुलपतियों की नियुक्ति की गई है, कुछ एक में प्रक्रिया चल रही है। इसी का नतीजा है कि कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर की रैंकिंग दसवें स्थान से तीसरे स्थान पर पहुंची है। कुलपतियों की नियुक्ति में तदर्थवाद नहीं चलेगा। ऐसे कुलपतियों का चयन किया जा रहा है, जो शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के साथ रोजगार परक शिक्षा को फोकस में लेकर चलें।
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विश्वविद्यालयों की मॉनिटरिंग कैसे करती हैं?

 मेरे पदभार संभालने के समय विश्वविद्यालयों में लगभग तीन सौ से अधिक कॉलेजों की संबद्धता के मसले लंबे समय से लटके हुए थे। विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में विश्वविद्यालयों की कार्य परिषद को वन टाइम समाधान का अधिकार दे दिया कि गुण दोष के आधार पर संबद्धता पर निर्णय लें। दूसरा, वीसी कांफ्रेंस के बाद तुरंत बैठक कर उसके कार्यवृत्त बनाकर एक्शन लिया जा रहा है। बैठकों में लिए जाने वाले निर्णय और दिशानिर्देशों के अनुपालन को लेकर राजभवन नियमित फॉलोअप करता है। इसका पूरा सिस्टम हमने विकसित किया है। एक अंबरेला एक्ट बनाकर शासन और विश्वविद्यालयों में अच्छा समन्वय बनाने की कोशिश हो रही है। इससे नियुक्तियों में भी पारदर्शिता आएगी।

कुछ ऐसा, राज्यपाल बनने के बाद जिसे मिस करती हैं?
राज्यपाल का बेहद जिम्मेदारी भरा पद है। इस पद के साथ एक विशेष प्रोटोकाल जुड़ा है। इससे पहले मैं रिश्तेदारों के यहां आ जा सकती थी। अब उतनी सुगमता से आना जाना नहीं हो पाता। आम महिलाओं की तरह अब बाजार नहीं जा पाती हूं। इसके अलावा ऐसे कोई बड़े शौक नहीं रहे, जिन्हें मैं मिस करूं। जब में आगरा की मेयर थी, उस दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। अब मेरी यही कोशिश रहती है कि मिली जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाऊं।
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