उत्तराखंड में पंचायत चुनाव पर सरकार बुरी तरह से घिरती दिख रही है। पहली चुनौती मंगलवार तक हाईकोर्ट के समक्ष 2011 की जनगणना के अनुसार परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया रखने की है दूसरी और राज्य निर्वाचन आयोग की 28 मार्च की डेडलाइन का संवैधानिक संकट है।
ऐसे में पंचायती राज विभाग की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। विभाग के सामने दो माह में के भीतर एक बार फिर सारी प्रक्रिया पर कसरत करना नहीं है।
मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन
पंचायत चुनाव की तैयारियों पर औंधे मुंह गिरने के बाद शुक्रवार को विभाग हाईकोर्ट में जवाब दाखिल करने में उलझा रहा। चूंकि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है तो विभागीय अधिकारी किसी भी ब्यान से बचते दिखे।
परिसीमन और आरक्षण को नए सिरे से पूरा करने का समय कम होने से विभाग दोबारा से कसरत में जुट गया है। हालांकि अभी तक यह अधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है कि 2011 की जनगणना के अनुसार परिसीमन कर पंचायतों पर आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया कब से शुरू होगी।
2001 की जनगणना के अनुसार जो आरक्षण लागू किया था उसपर मचा सियासी घमासान फिलहाल हाईकोर्ट के अगले आदेश तक थम गया है।
मुश्किल हुई शासन व आयोग की राह
गुरुवार को आरक्षण पर रोक लगने के बाद चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह से थम गई है। शासन के पास नए सिरे से परिसीमन और आरक्षण प्रक्रिया पूरी करने के लिए फरवरी पहले हफ्ते तक का समय है। जबकि कार्यवाही हाईकोर्ट के 3 दिसंबर को सुनवाई के बाद शुरू होगी।
दूसरी तरफ राज्य चुनाव आयोग के सामने मतदाता सूची का प्रकाशन करने की दिक्कत अधिकतम 15 फरवरी तक है और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शासन कितनी जल्दी परिसीमन करवाता है।