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उत्तराखंड सरकार का बेहतर फैसला, पानी बचाओ-बोनस पाओ

Tue, 21 Jun 2016 12:24 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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Drinking water
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जल संकट को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने जल संवर्धन एवं संरक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में बेहतर फैसला लिया है।
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इसके तहत पूरे प्रदेश में तालाब (चाल-खाल) बनाने और उसमें पानी संचित करने पर अनुदान से लेकर बोनस तक दिया जाएगा। प्रत्येक माह तालाब में संचित जल की माप लेकर उसकी गणना करके मौजूदा वॉटर टैक्स के बराबर भुगतान किया जाएगा। माना जा रहा है कि इस योजना से न केवल जल संचयन होगा, बल्कि रोजगार का मौका भी मिलेगा। उधर, शहरी इलाकों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग से संबंधित नियमों को सख्ती से लागू किए जाने की बात भी कैबिनेट में तय हुई है।

मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह और सचिव पेयजल अरविंद सिंह ह्यांकी ने बताया कि जल संचयन को बढ़ावा देने के मकसद से लागू की गई इस योजना के तहत सरकार तालाबों से संबंधित विशेष डिजाइन तैयार कराएगी। इन डिजाइन पर आधारित तालाब बनाने की स्थिति में सरकार अनुदान देगी। इसके तहत यदि शासकीय सहायता या किसी अन्य योजना के तहत तालाब बनाए जाते हैं तो कुल खर्च की एक तिहाई राशि अनुदान के रूप में दी जाएगी।
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वहीं यदि किसी सहायता और योजना के अलावा अपने खर्च पर तालाब बनाने की स्थिति में कुल खर्च का 40 फीसदी अनुदान दिया जाएगा। बारिश का मौसम बीत जाने के बाद प्रत्येक वर्ष अक्तूबर माह में जिला स्तर पर बनाई जाने वाली कमेटियां इन तालाबों में एकत्र जल की माप करेंगी। इसके बाद इसका गुणा-गणित करके वॉटर टैक्स की दर के हिसाब से संबंधित व्यक्ति को भुगतान किया जाएगा।

अधिकारियों ने बताया कि इसके लिए व्यक्ति विशेष के अलावा ग्राम और वन पंचायतें व एनजीओ भी पात्र हो सकते हैं। इस मद में होने वाले खर्च के लिए अलग से बजट दिया जाएगा। योजना का जोरशोर से प्रचार-प्रसार भी किया जाएगा। इसके अलावा वन विभाग और जलागम को भी जल संरक्षण की दिशा में अधिक से अधिक प्रयास करने के भी निर्देश दिए जाएंगे। वहीं रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन करवाया जाएगा। इसके लिए जिलाधिकारियों के स्तर से पूरा सहयोग दिया जाएगा।

धारा 31 पर विवाद खत्म, सरकार ने किया दोबारा लागू
वाणिज्य कर में उत्तराखंड मूल्य वर्धित कर अधिनियम 2005 में विवाद खत्म हो गए हैं। सरकार ने उद्योगपतियों और व्यापारियों की मांग मानते हुए धारा 31 को दोबारा लागू कर दिया है। इसके साथ ही अब उन्हें आठ साल के बजाए छह साल का लेखा ब्यौरा संजोकर रखना होगा। इससे व्यापारियों व उद्योगपतियों को बड़ी राहत मिली है।

31 मार्च को वाणिज्य कर की ओर से एक्ट में संशोधन कर धारा 31 खत्म कर दी गई थी। धारा 31 के तहत जो केस एक्स पार्टी किए जाते हैं, उन्हें केस रिओपेन करने का अधिकार मिलता था। इसके खत्म होने की वजह से एक लाख या पांच प्रतिशत में से जो भी कम हो, उसके आधार पर अपील करने का प्रावधान किया गया था। मामले में व्यापारियों के अलावा इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड ने भी सख्त विरोध जताया था।

सोमवार को हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने नाराजगी दूर करते हुए एक्ट में दोबारा संशोधन करते हुए धारा 31 को लागू कर दिया है। साथ ही यह भी प्रतिबंध किया गया है कि धारा 31 का प्रयोग केवल एक बार ही किया जा सकता है। धारा 31 के दोबारा स्थापित होने के कारण धारा 32(6) को भी दोबारा स्थापित कर दिया गया है।

साथ ही यह शर्त भी रखी गई है कि धारा 31 के तहत खोले गए वाद को तीन माह के भीतर निस्तारित करना होगा। धारा 61 के तहत इंकम टैक्स की किताबें रखने की समय सीमा भी आठ वर्ष से दोबारा छह वर्ष कर दी गई है। इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के अध्यक्ष पंकज गुप्ता ने कहा कि यह सभी उद्योगपतियों और व्यापारियों के लिए राहत की बात है।
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क्या है धारा 31
उत्तराखंड मूल्य वर्धित कर अधिनियम 2005 के तहत 31 मार्च तक वाणिज्य कर की ओर से केस पूरे न होने की वजह से एक्स पार्टी ऑर्डर कर दिए जाते थे। एक्ट की धारा 31 के तहत प्रभावित उद्योगपति या व्यापारी अपने केस को रिओपेन कराने की अपील करता है। अपीलीय अधिकारी की ओर से उसका निस्तारण कर दिया जाता है।

Published By : Nirmala Suyal
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