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केंद्र से दो-दो हाथ करने की तैयारी में उत्तराखंड सरकार

Tue, 30 Dec 2014 02:53 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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संवेदी क्षेत्र पर प्रदेश सरकार को जो करना चाहिए था वह तो नहीं किया, अब दो साल बाद इस मुद्दे पर केंद्र से टकराव का ऐलान कर दिया। उल्लेखनीय है कि रविवार को हुए कैबिनेट बैठक में सरकार ने संवेदी क्षेत्र को सीधे ना करने की बात कही है।
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आलम यह है कि गंगोत्री संवेदी क्षेत्र (इको सेंसिटिव जोन) को लेकर प्रदेश सरकार दो साल तक इस बात से बिलकुल अनजान बनी रही कि क्षेत्र की आंचलिक महायोजना को तैयार कर स्थानीय निवासियों की अधिकतर समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

18 दिसंबर, 2012 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना में साफ प्रावधान था कि दो साल में आंचलिक महायोजना तैयार कर ली जाए। इस आंचलिक महायोजना में यह तय कर लिया जाए कि स्थानीय लोगों के अधिकारों का हनन न हो और उनकी जरूरतों को भी पूरा किया जा सके।
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अधिसूचना में न सड़क बनाने पर रोक है और न नए मकान, दुकान, रिजार्ट बनाने पर। इतना जरूर है कि हर तरह की गतिविधि को नियमित करने और पर्यावरण पर प्रभाव का आकलन करने पर जोर है।

दो साल तक केवल विरोध जताती रही सरकार

आंचलिक महायोजना भी स्थानीय निवासियों, विशेषकर महिलाओं के सहयोग से बनाने को कहा गया। यह भी साफ कर दिया गया था कि महायोजना में स्थानीय विकास की रूपरेखा भी तय कर ली जाए। इसके लिए दो साल का समय था।

प्रदेश सरकार संवेदी क्षेत्र को स्याह बताकर उसके विरोध में ही जुटी रही। अगर साथ ही आंचलिक महायोजना भी तैयार कर ली गई होती तो प्रदेश सरकार अपने लिए पर्वतीय क्षेत्र के विकास का एक माडल भी खड़ा कर सकती थी।

हद यह हुई कि पूरा डेढ़ साल बीतने के बाद जुलाई में महायोजना पर कसरत शुरू की गई। उसके लिए भी दक्ष कंपनियों को न्योता दिया गया। अब कहा जा रहा है कि जो निविदाएं आई हैं वे संतोषजनक नहीं हैं। लिहाजा अबविशेषज्ञ संस्थान जैसे रुड़की आईआईटी, वन्य जीव संस्थान आदि की मदद से महायोजना बनाई जाएगी।

निगरानी समिति ने की कुल दो बैठक
अधिसूचना में यह भी कहा गया था कि अधिसूचना जारी होने केएक साल के अंदर निगरानी समिति बनाई जाएगी, जिसके सदस्य सचिव उत्तरकाशी जिलाधिकारी होंगे। यह निगरानी कमेटी गठित भी है, लेकिन इसकी अभी तक कुल दो बार ही बैठक हुई है। अब आगे का कोई भी काम निगरानी समिति की देखरेख में ही होना है।
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अधिसूचना में ये हैं प्रावधान

-स्थानीय लोगों के अधिकार
-राज्य सरकार अधिसूचना जारी होने की तिथि से दो साल के अंदर स्थानीय जनता, विशेषकर महिलाओं के सहयोग से आंचलिक महायोजना तैयार करेगी।
-आंचलिक महायोजना वन, पर्यावरण, शहरी विकास, राजस्व, पंचायत सभी विभागों से समन्वय कर बनाई जाएगी।
-राज्य या केंद्र की ओर से सीमा क्षेत्र की कोई भी योजना आंचलिक महायोजना में शामिल की जाएगी।
-आंचलिक महायोजना में ऐसे प्रावधान किए जाएंगे जिसमें जल क्षेत्रों का प्रबंधन, मिट्टी का संरक्षण, स्थानीय समुदायों के हितों का संरक्षण सहित अन्य पहलू शामिल हों।
-आंचलिक महायोजना में यह तय किया जाएगा कि नदियों और सहायक नदियों की प्राकृतिक सीमा का प्रयास न हो
-आंचलिक महायोजना में ग्रामीण बस्तियां, वन, कृषि तथा अन्य सभी क्षेत्र चिह्नित किए जाएंगे।
-संवेदी क्षेत्र में होटल, भवन, रिसार्ट के निर्माण के लिए स्थानीय परंपरा और वास्तुकला का पूरा ध्यान रखा जाएगा। आंचलिक महायोजना में इसके लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।
-संवेदी क्षेत्र में इस तरह से विकास किया जाएगा कि वहां के वास्तविक निवासियों के अधिकार और विशेषाधिकार को प्रभावित किए बिना स्थानीय निवासियों की जरूरत पूरी हो सके।
-आंचलिक महायोजना में स्थानीय निवासियों की जीवन यापन की सुरक्षा के लिए पर्यावरण अनुकूल विकास सुनिश्चित किया जाएगा।
- क्षेत्र में पर्यटन, तीर्थ यात्रा और स्थानीय उपयोग के लिए पैदल मार्गों को प्रोत्साहित किया जाएगा

सड़क
- पांच किलोमीटर से अधिक किसी भी सड़क के लिए आंचलिक महायोजना में दिशा-निर्देश तय किए जाएंगे
- सड़क का मलबा सड़क बनाने में ही उपयोग किया जाएगा
- सड़कों के किनारे पर्याप्त संख्या में नाले बनाए जाएंगे, पहाड़ का ढाल अस्थिर हो रहा हो तो उपचार किया जाएगा

जो नहीं होगा
- संवेदी क्षेत्र में जल विद्युत परियोजनाएं नहीं बनेंगी, सिवाय ग्राम सभा की सहमति से सूक्ष्म और लघु परियोजनाएं बनाई जाएंगी, जिससे स्थानीय लोगों की जरूरत पूरी हो सके
- किसी भी तरह का खनन केवल स्थानीय लोगों की जरूरत पूरा करने तक के लिए ही

जो योजना बनाकर किया जा सकेगा
- होटल और रिसार्ट की स्थापना
- विद्युत केबल बिछाना
- चीड़ और अन्य प्रजातियों को लगाना
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