प्रदेश सरकार केदारनाथ आपदा पीड़ितों को अतिरिक्त मुआवजा देने को फिलहाल तैयार नहीं है। नैनीताल उच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को आपदा पीड़ितों का मुआवजा 50 फीसदी बढ़ाकर देने के आदेश पारित किए थे।
अदालत के इस आदेश के बाद गंभीर सोच में पड़ी सरकार ने लंबे मंथन के बाद सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा दिया। प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के उस आदेश को भी चुनौती दी है, जिसमें याचिका कर्ताओं को देने के लिए 50 हजार रुपये की कास्ट लगाई गई है। न्यायालय में प्रदेश सरकार की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) मंजूर कर लग गई है और इस मामले में याचिका कर्ताओं को 23 फरवरी से पहले अपना पक्ष रखने को कहा गया है।
हाईकोर्ट ने ये आदेश पारित किए थे
- वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के पीड़ितों को 50 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा दिया जाए।
-बेघरों के घरों व सार्वजनिक भवनों के पुनर्निर्माण को तीन माह में नीति बनाई जाए।
-आपदा में अनाथ हुए बच्चों को पोस्ट ग्रेजुएट तक निशुल्क शिक्ष व बोर्डिंग का खर्च उठाए सरकार
-आपदा में परिजनों को खोने वाले बच्चों को प्रतिमाह 7500 रुपये मानदेय दिया जाए।
-कोर्ट मुख्य सचिव को आदेशों पर कार्रवाई के लिए जवाबदेह बनाया है।
आदेश के खिलाफ सरकार का तर्क
सर्वोच्च न्यायालय में प्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय के जिस आदेश के खिलाफ रोक लगाने का अनुरोध किया है, उनमें सबसे पहला 50 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा देने का मामला है। एसएलपी में सरकार ने तर्क दिया कि 2013 की आपदा में प्रदेश सरकार ने 700 करोड़ रुपये राहत एवं बचाव कार्यों पर खर्च किए। सरकार ने एनडीएमए और एसडीआरएफ के मैनुअल से अधिक राहत राशि आपदा पीड़ितों को आवंटित की। सरकार मानना है कि 50 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा दिया गया तो इससे 350 करोड़ रुपये की वित्तीय बोझ पड़ेगा। सरकार की वित्तीय स्थिति के मद्देनजर सरकार के लिए इतनी बड़ी राशि देना संभव नहीं है।