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चमोली आपदाः कुदरत की एक तिहाई घटनाएं अबूझ पहेली, मानवकृत सुरंगें भी खतरनाक

Wed, 10 Feb 2021 02:58 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal कुमार अतुल, अमर उजाला, देहरादून
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चमोली आपदा - फोटो : अमर उजाला
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चमोली जिले के तपोवन क्षेत्र में आई आपदा के कारणों की तलाश जारी है। दो दिनों के भीतर विशेषज्ञों ने इसकी वजह को लेकर कई संभावित तथ्य बताए हैं। किसी ने कहा एवलांच (बर्फीले तूफान) की वजह से जलप्रलय आया तो किसी ने कहा कि ग्लेशियर टूटने की वजह से यह आपदा आई।

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चमोली जल प्रलयः वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के शोध में सामने आई आपदा से जुड़ी ये बड़ी बातें

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इसरो विशेषज्ञों के हवाले से बताया कि जल प्रलय ग्लेशियर टूटने से नहीं, बल्कि लाखों टन बर्फ फिसलने से आया। इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक और नेशनल क्लाइमेट सेंटर के पूर्व चेयरमैन और अंतरराष्ट्रीय मौसम वैज्ञानिक डॉक्टर अरविंद कुमार का कहना है कि उत्तराखंड की आपदा की वजह मानवकृत सुरंगों का निर्माण भी हो सकता है। उनका कहना था कि सही वजह अध्ययन के बाद ही पता चल सकती है। 
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डॉक्टर अरविंद कुमार का कहना था कि कई बार कुदरती घटनाओं का कारण वैज्ञानिकों को भी ठीक-ठीक ज्ञात नहीं हो पाता। दरअसल प्रकृति में एक प्रकार की अंतर्निहित ताकत छुपी होती है। इसे कैवोटिक नेचर ऑफ द नेचर (कुदरत की उथल-पुथलकारी शक्ति) कहा जाता है। कई घटनाओं में प्रकृति खुद को संतुलित भी करती है, जिसमें कई बार त्रासदपूर्ण और कई बार सकारात्मक घटनाएं भी होती हैं।

उन्होंने उदाहरण दिया कि ओजोन लेयर में छिद्र के लगातार बढ़ते जाने पर कभी पूरी दुनियां चिंतित थी। लेकिन हमने पर्यावरणीय स्तर पर कोई बहुत सकारात्मक काम नहीं किया फिर भी कुदरत खुद ओजोन लेयर का छेद भरने में जुटी और नतीजतन छिद्र छोटा हो गया। इसकी वैज्ञानिक वजह कोई स्पष्ट नहीं कर पाया। इसी तरह लगभग स्थिर पठारी क्षेत्र कोयना में आए बड़े भूकंप की वजह भी स्पष्ट रूप से वैज्ञानिक नहीं बता पाए।

हिमालय जैसे अस्थिर क्षेत्र में भूकंप आना स्वाभाविक है लेकिन कोयना जैसे पठारी इलाके में भूकंप का आना अचरज से कम नहीं। कई विशेषज्ञों ने इस भूकंप को मानवकृत माना था। कोयना बांध बनाकर बड़े पैमाने पर जल एकत्र किया गया था।
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फिलहाल हिमालय की पहाड़ियां बेहद नाजुक और कच्ची हैं। भूकंप और पर्यावरणीय लिहाज से यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। यहां पर सड़क, सुरंग और बांध निर्माण के लिए विस्फोटकों का प्रयोग का भी असर पड़ता है। हमें हिमालयी क्षेत्र में अगर बड़ी कुदरती त्रासदी से बचना है तो विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच का रास्ता अख्तियार करना होगा।      

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