- 14.2 फीसदी बेरोजगारी दर केंद्रीय श्रम बल आयोग के सर्वेक्षण में
- 4,69,907 पंजीकृत बेरोजगार हैं प्रदेश में
- 734 गांव पूरी तरह से खाली पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार
- 50 फीसदी रोजगार और 15 फीसदी शिक्षा के लिए हो रहा पलायन
- अल्मोड़ा के 71 गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा नहीं।
- 80 गांवों से 50 फीसदी तक पलायन।
- 1072 चिकित्सा अधिकारियों के पद प्रदेश में रिक्त, स्वीकृत हैं 2735।
- 24.6 फीसदी स्कूलों में ही छात्र और शिक्षक का अनुपात है पूरा
- 31.50 फीसदी स्कूलों में खेलने के लिए मैदान तक नहीं।
- 7.41 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती, तीन लाख हेक्टेयर भूमि बंजर।
-150 जलस्त्रोत सूखे और 500 सूखने की कगार पर। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार
-12 लाख 45 हजार 472 घरों में पानी का नल नहीं।
16146 बस्तियों में 40 लीटर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति से कम पानी मुहैया।
पहाड़ों की भौगोलिक स्थितियों के अनुसार विकास की योजनाएं बनाई जा सकें, इसे लेकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी। लेकिन 20 सालों में उत्तराखंड यूपी का छोटा संस्करण बनकर रह गया है। जनभावनाओं को दरकिनार कर राजधानी गैरसैंण के बजाए देहरादून बना दी गई। राज्य का विरोध करने वालों को तरजीह दी जाती रही और आंदोलनकारियों का दमन करने वालों की हिफाजत होती रही है। उत्तराखंड की दुर्दशा की बड़ी वजह आंदोलनकारी और हमदर्द ताकतों का सत्ता में नहीं आना रहा है।
-बल्ली सिंह चीमा, जनकवि
उत्तराखंड 20 वर्षों बाद भी दूसरे राज्यों के विकास मॉडल को ढो रहा है। उत्तराखंड तभी संपन्न और खुशहाल हो सकता है जब यह आर्थिक क्षेत्र में अपने उत्पादों की देश के बाजारों में अलग पहचान बनाए और ये उत्पादन पहाड़ी कृषि और बागवानी के हों। बाहर के उद्योगों की शाखायें उत्तराखंड में खोलने से उत्तराखंड को मॉडल स्टेट नहीं बनाया जा सकता है।
- बद्री दत्त कसनियाल, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक पिथौरागढ़।
उत्तराखंड बनाते वक्त आंखों में जो सपना था, उसके लिए ठोस रोड मैप नहीं बना। युवाओं के सवाल थे पढ़ाई और कमाई के, तो बुजुर्गों के लिए दवाई की जरूरत थी। काश्तकार के लिए सिंचाई और इससे ज्यादा चकबंदी जरूरी थी। गांव के उत्पादक क्षेत्रों को सड़क, रज्जुमार्ग से जोड़ने के साथ विपण केंद्र उपलब्ध कराने की जरूरत थी। लेकिन हुआ क्या? अस्पताल बढ़ गए, स्कूल बढ़ गए, और ये निर्माण इलाज या निशुल्क शिक्षा के लिए नहीं ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देने के लिए हुए। दो दशक की इस मायूसी को दूर करने के लिए नीति, नीयत और नजरिए को बदलना होगा।
- एडवोकेट नवीन मुरारी।
मैदानी क्षेत्र में कृषि, तो पहाड़ में मडुवा, लाल चावल, गहत सहित कई पहाड़ी उत्पादों की जैविक खेती, कीवी, फूलों की खेती और बागवानी में अपार संभावनाएं हैं। बिखरी जमीन की चकबंदी हो। पंचेश्वर जैसे साहसिक पर्यटन स्थल, शिकारी जिम कार्बेट, आध्यात्मिक महामानव स्वामी विवेकानंद की एतिहासिक धरोहरें, हिम दर्शन के लिए मुफीद एबटमाउंट, मां पूर्णागिरि धाम, बगवाल के लिए मशहूर मां बाराही धाम देवीधुरा, रीठा साहिब गुरुद्वारा, मायावती आश्रम, श्यामलाताल जैसे अहम स्थलों तक पर्यटकों की पहुंच आसान बनाकर पर्यटन को आमदनी का बड़ा जरिया बनाया जा सकता है।
-सुधीर साह, पूर्व अध्यक्ष दुग्ध संघ, चंपावत।