हम इस अभियान में पूरी तल्लीनता के साथ जुटे थे। पुलिस से बचने के लिए हमें एक उपाय सूझा। हमने पुलिस इंस्पेक्टर का घर ही किराये पर ले लिया। हम सुबह वहां से निकल जाते थे और देर शाम को लौटते थे। पुलिस इंस्पेक्टर के घर पर होने की वजह से पुलिस को भी हम पर संदेह नहीं होता था। मुझे मेरठ की बच्चा जेल की याद है।
इसकी क्षमता 250 की थी, लेकिन जब आंदोलन अपने चरम पर पहुंचा और पुलिस ने धर-पकड़ शुरू की तो यही बच्चा जेल 1100 कारसेवकों से ठसाठस भर गई थी। हम जेल में कारसेवकों की कुशलक्षेम पूछने जाते थे। हमारी यह कोशिश रहती थी कि कोई भी कारसेवक पुलिस की गिरफ्त में न आए, इसलिए हम अयोध्या के पास के जिस स्टेशन तक का टिकट कारसेवकों के लिए लेते थे, वहां उन्हें उतरने नहीं देते थे।
वे एक-दो स्टेशन पहले ही उतर जाते थे, ताकि वे पुलिस से बच सकें। एक घटना मुझे देहरादून की भी याद आती है। घंटाघर के पास एक बड़ा प्रदर्शन हो रहा था। भारी पुलिस बल तैनात था। तभी एक नौजवान को मसखरी सूझी। वह इंस्पेक्टर के कमर पर लटकी रिवाल्वर पर हाथ मारा और चंपत हो गया। इंस्पेक्टर हैरान-परेशान थे।
संघर्ष के उस दौर में हमें पूरा विश्वास था कि जो लक्ष्य लेकर हम चल रहे हैं, वह दिन जरूर आएगा, जब अयोध्या में रामलला भव्य और दिव्य मंदिर में विराजमान होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में 22 जनवरी को भव्य राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। यह हम सभी के लिए बहुत गौरव की बात है।
(त्रिवेंद्र सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखंड)