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B.C Khanduri Death: पिता के निधन पर छलका बेटी का दर्द, लिखा श्रद्धांजलि संदेश, पढ़कर हो जाएंगे भावुक

Tue, 19 May 2026 04:58 PM IST
Alka Tyagi अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

Uttarakhand Former CM B.C. Khanduri Death: उत्तराखंड के पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी का आज निधन हो गया। इस दौरान उनकी बेटी ने पिता के नाम एक संदेश लिखा।
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पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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उत्तराखंड में दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी का आज निधन हो गया। उनकी बेटी विधानसभा स्पीकर ऋतु खंडूड़ी भूषण ने पिता के नाम संदेश लिखा। उन्होंने लिखा ' आज शब्द साथ नहीं दे रहे हैं। मैंने केवल अपने पिता को नहीं खोया, बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े संबल, मार्गदर्शक और उस व्यक्तित्व को  विदा किया है जिसकी छाया में मैंने ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता, अनुशासन और राष्ट्र सेवा तथा उत्तराखंड का अर्थ समझा।'

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लिखा कि मेजर जनरल (रि.) भुवन चंद्र का जीवन किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की एक जीवंत गाथा था। एक अक्तूबर 1934 को प्रारंभ हुई उनकी जीवन यात्रा भारतीय सेना के रणक्षेत्रों से लेकर लोकतंत्र के सर्वोच्च मंचों और उत्तराखंड की जनसेवा तक पहुंची, लेकिन हर भूमिका में उनकी पहचान एक ही रही-राष्ट्र प्रथम।

1954 में भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त करने के साथ उन्होंने मातृभूमि की सेवा का जो संकल्प लिया, उसे जीवन  भर निभाया। उन्होंने 1962 के भारत–चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत–पाक युद्धों में देश के लिए अपना कर्तव्य निभाया। सीमाओं पर बिताए वे वर्ष केवल  एक सैनिक के साहस की कहानी नहीं थे, बल्कि उन अनगिनत त्यागों की भी कहानी थे जो एक सैनिक का परिवार मौन रहकर करता है।
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जब वे सीमा पर राष्ट्र  की सुरक्षा में तैनात रहते थे, तब परिवार ने भी उनके साथ एक अलग युद्ध जिया-प्रतीक्षा का, अनिश्चितता का और मौन चिंता का। हमारे बचपन के अनेक क्षण ऐसे रहे जब पिता का स्नेह पत्रों में मिलता था, उनकी उपस्थिति स्मृतियों और प्रतीक्षा में महसूस होती थी। लेकिन उन्होंने हमें कभी शिकायत नहीं, बल्कि गर्व  करना सिखाया कि राष्ट्रसेवा केवल सैनिक नहीं करता, उसका परिवार भी उस संकल्प का सहभागी होता है। सेना में लगभग छत्तीस वर्षों की गौरवपूर्ण सेवा  के दौरान उन्होंने नेतृत्व, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल स्थापित की कि 26 जनवरी 1982 को उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया।

मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने विश्राम का मार्ग नहीं चुना। 1991 में सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर उन्होंने जनसेवा को अपना नया दायित्व बनाया। गढ़वाल की जनता ने उन्हें बार-बार संसद भेजा और उन्होंने सांसद, केंद्रीय मंत्री तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की। भारत सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री रहते हुए उन्होंने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और गोल्डन क्वाड्रिलेटरल जैसी ऐतिहासिक योजनाओं को गति दी, जिसने आधुनिक भारत की विकास यात्रा को नई दिशा दी।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सादगी, पारदर्शिता और सुशासन का पर्याय बना। मजबूत लोकायुक्त कानून, प्रशासनिक सुधार और जनहित को सर्वोच्च रखने का उनका  आग्रह सदैव याद रखा जाएगा। लेकिन मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी पहचान किसी पद या सम्मान से नहीं थी। वे मेरे पिता थे-कम बोलने वाले, लेकिन मूल्यों पर  अडिग; कठोर दिखने वाले, लेकिन भीतर से अत्यंत संवेदनशील। उन्होंने हमें सिखाया कि जीवन में ईमानदारी सबसे बड़ी पूँजी है, और पद की गरिमा व्यक्ति के आचरण से बनती है।
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उनसे मैंने सीखा कि सार्वजनिक जीवन में निर्णय लोकप्रिय होने के लिए नहीं, सही होने के लिए लिए जाते हैं। आज जब मैं पीछे मुड़कर  देखती हूँ, तो समझ पाती हूँ कि राष्ट्र ने जिन उपलब्धियों और सेवाओं के लिए उन्हें सम्मान दिया, उनके पीछे एक ऐसा जीवन था जिसने व्यक्तिगत  सुख-सुविधाओं से अधिक कर्तव्य को चुना। परिवार ने भी उनका समय, उनकी उपस्थिति और जीवन के अनेक निजी क्षण राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित होते देखे, और यही त्याग हमारे लिए गर्व का आधार बना।

उनका जाना मेरे और हमारे पूरे परिवार के लिए एक ऐसी रिक्तता है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। फिर भी यह संतोष रहेगा कि उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज के प्रति ईमानदार दायित्व निभाते हुए जिया। पिताजी, आपने हमें केवल जीवन नहीं दिया—जीवन जीने के मूल्य दिए। आपका अनुशासन, आपका साहस, आपकी सत्यनिष्ठा और आपकी सीख सदैव हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी।
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