आपदा के बाद पुनर्वास की आस में पहाड़, सूबे के हाकिमों की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। जख्मी पहाड़ को लगता है कि शायद उनके घावों पर बंद कमरों में बैठे हाकिम मरहम लगाने बाहर निकलेंगे।
उसे यह मालूम नहीं है कि वह यह माने बैठे हैं कि आपदा तो आकर चली भी गई। हर बार की तरह पहाड़ की चीख इस बार भी घाटियों में दबकर रह जाएगी। ऊपर से सबसे बड़ा संतोष यह है कि दिल्ली दरबार से आने वाले बड़े साहेबान भी पहाड़ों से दूर रहते हैं।
दिल्ली से चलकर उनके कदम दून में थम जाते हैं। और इतनी दूर से पहाड़ के जख्म दिखते भी नहीं। माहौल अपने अनुकूल होता देख खुद को हाकिमों का हाकिम मान चुके एक साहब तो इस जुगत में हैं कि पहाड़ों के जख्म पर मरहम लगाने को जो दवा आए उससे किस तरह तरह अपनी सेहत सुधारी जाए।
सूबे के हुकूमरानों के लिए भी यह हाकिम खुद को हुकूम का इक्का साबित कर चुका है। इक्के को कमान देने के लिए बादशाह बनाने की तैयारी भी चल रही है।
पहले से और मजबूत होकर इक्का अब हुकूमरानों को पहाड़ का इलाज बता रहा है। जख्मों का इलाज करने के बजाए उन्हें ढांपने का पुराना नुस्खा भी दिया है।
नुस्खा हर बार की तरह इस बार कारगर होता दिख रहा है। अगर कोई दूर से देखेगा भी तो उसे पहले की तरह पहाड़ खड़ा मिलेगा। अंदर के जख्म नासूर बन भी गए तो उससे बहने वाला मवाद हर बार की तरह पहाड़ की ओट में रहने वालों को निगलेगा। हाकिम तो यह माने बैठे हैं कि उनका कद पहाड़ से भी ऊंचा है। ऐसे में उसकी क्या बिसात जो उनको छू भी पाए।