उत्तराखंड में पराजय के गम में डूबी कांग्रेस विचार कर रही है कि आखिर वह क्यों हारी और भाजपा सत्तारोधी रुझान, महंगाई और बेरोजगारी सरीखे ज्वलंत मुद्दों के बावजूद कैसे बड़ा बहुमत हासिल कर गई। कांग्रेस इसे बेशक एक अबूझ पहेली मान रही है, लेकिन शानदार जीत से चहक रही भाजपा के लिए यह पहेली नहीं बल्कि मोदी मैजिक के साथ सांगठनिक रणनीति की करामात है।
चुनाव से छह महीने पहले ही भाजपा अपने सांगठनिक रणनीति का मंत्र फूंक चुकी थी, जबकि कांग्रेस का प्रमुख तंत्र गुटबाजी में उलझा हुआ था। अमर उजाला ने प्रदेश महामंत्री संगठन अजेय कुमार और प्रदेश महामंत्री कुलदीप कुमार से भाजपा की जीत में संगठन की भूमिका के बारे में पूछा तो उन्होंने पार्टी के वे 10 मंत्र बताए जिन्होंने भाजपा की जीत की पटकथा लिखी। जिन्हें हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं....
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आठ माह पहले चुनाव का लक्ष्य बनाया
पार्टी ने विधानसभा चुनाव से आठ महीने पहले लक्ष्य बनाया। चिंतन बैठक के जरिये एक चरणबद्ध ढंग से कार्ययोजना तैयार की। जिसे सिलसिलेवार धरातल पर उतारा गया।
छह महीने पहले 70 सीटों पर विस्तारक भेजे
पार्टी ने चुनाव से छह महीने पहले सभी 70 विधानसभा सीटों पर विस्तारकों को तैनात किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा संगठन के बीच की इस अहम कड़ी को चुनाव क्षेत्र में प्रत्याशी और पार्टी की नब्ज टटोलने का जिम्मा दिया। वे चुनाव तक अपनी भूमिका निभाते रहे।
तीन महीने पहले प्रभारी तैनात कर दिए
चुनाव से तीन महीने पहले पार्टी सभी सीटों पर प्रभारी तैनात कर दिए। ये जिम्मेदारी पार्टी के पूर्व विधायकों, वरिष्ठ पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को सौंपी गई। उन्हें दूसरी विधानसभा सीट पर भेजा गया ताकि वे प्रभावित होकर काम न करें बल्कि सही फीडबैक दें।
महिलाओं को सह प्रभारी बनाने का प्रयोग
पार्टी ने पहली बार महिलाओं को सह प्रभारी बनाने का प्रयोग किया। यह प्रयोग कारगर रहा। पार्टी की कई महिला नेत्रियों को दायित्व मिला। पार्टी के लिए महिला मतदाताओं तक पहुंचना सहज हो गया। उनके माध्यम से कार्यक्रम चलाए गए।
हर विस में दो प्रवासी कार्यकर्ता
चुनाव से ठीक एक महीने पहले पार्टी ने हर विधानसभा सीट पर दो प्रवासी कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया। दूसरे राज्यों से आए इन प्रवासी कार्यकर्ताओं ने बैठकों के जरिये पक्ष, विपक्ष की रणनीति का मंथन किया। बूथों पर 92 हजार से अधिक बैठकें पार्टी ने जिला प्रभारी व सह प्रभारी बनाएं। सभी प्रभारियों को हर बूथ पर कम से कम 50 लोगों की बैठकें करने का जिम्मा सौंपा। ऐसी करीब 92 हजार बैठकें हुईं। ये बैठकें कार्यकर्ताओं के घरों पर हुईं।