गोविंद वल्लभ पंत, हेमवंती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी जैसे दिग्गज नेताओं की समृद्ध विरासत वाली कांग्रेस के लिए उत्तराखंड के लिए सियासी उपजाऊ जमीन रही है। हालांकि कांग्रेस देश के दूसरे हिस्सों की तरह ही आपात काल के बाद कुछ वर्षों के लिए हाशिए पर चली गई थी, लेकिन फिर उसने नवगठित राज्य में जड़ जमा ली थी। आलम यह था कि गठन के बाद भाजपा की अंतरिम सरकार के बाद तत्काल हुए चुनाव में पार्टी ने विधानसभा चुनावों में बाजी मार ली थी।
रणजीत सिंह वर्मा सरीखे गैर कांग्रेसी नेता के साथ चलने को मजबूर थे कांग्रेसी
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान कांग्रेस की स्थिति कुछ ऐसी थी कि इसके नेता उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का नेतृत्व कर रहे रणजीत सिंह वर्मा सरीखे गैर कांग्रेसी नेता के साथ चलने को मजबूर थे। 1999 में जब उत्तरप्रदेश की भाजपा सरकार विधानसभा में उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए संकल्प व बिल लाई, तब पृथक बनने वाले प्रस्तावित राज्य में कांग्रेस में हलचल शुरू हुई। वर्ष 2000 नवंबर आते-आते कांग्रेस में जान पड़ने लगी और राज्य गठन से ठीक पहले विभिन्न वर्गों के लोग कांग्रेस में शामिल हुए और राज्य में पार्टी मजबूत होने लगी।
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राज्य में हुए पहले विधानसभा चुनावों में परिणाम जब आने शुरू हुए तो शुरुआती रुझान भाजपा के पक्ष में आते देखे। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत ने प्रेस के समक्ष हार स्वीकारते हुए हार की जिम्मेदारी भी ले ली। लेकिन एक घंटे में ही परिदृश्य बदल गया और कांग्रेस के 36 विधायक जीत गए। इसके बाद हरीश रावत के पक्ष में विधायकों का एक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। लेकिन बाद में कुछ विधायकों ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के समक्ष पेश होकर अपने हस्ताक्षर नकली होने की बात कह दी। इसके बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एनडी तिवारी विराजमान हो गए।
एनडी ने पूरे पांच साल सरकार चलाई। पार्टी ने हरीश रावत को राज्यसभा भेज दिया। वर्ष 2022 के चुनाव में कांग्रेस एक फिर केंद्र और राज्य के सत्तारोधी रुझान के दम पर चुनावी नैया पार लगाने की सोच रही है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, गैरसैंण, देवस्थानम बोर्ड और भू-कानून कांग्रेस के मुख्य चुनावी हथियार हैं। वर्ष 2017 के विस चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया था। पार्टी मात्र 11 सीटों पर सिमटकर रह गई थी।
नौ नवंबर 2000 को राज्य गठन के दौरान उत्तराखंड में अंतरिम विधानसभा में 30 सदस्य थे। इनमें यूपी के समय चुने हुए 22 विधायक और आठ विधान परिषद सदस्य थे। 22 विधायकों में 17 भाजपा के, एक तिवारी कांग्रेस का, एक बसपा और तीन समाजवादी पार्टी के थे। जबकि कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं था।
कांग्रेस को 2002 में पहली निर्वाचित सरकार बनाने का मौका मिला
14 फरवरी 2002 को पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर सरकार बनाई। भाजपा 19 सीटों पर सिमट गई। बसपा ने सात सीटें जीतीं, जबकि क्षेत्रीय दल यूकेडी भी चार सीटें जीतने में कामयाब रही।
वर्ष 2007 में बढ़ा कांग्रेस का वोट प्रतिशत, सरकार भाजपा ने बनाई
वर्ष 2002 में 26.91 प्रतिशत वोट के मुकाबले उसे वर्ष 2007 में 29.59 प्रतिशत वोट मिले। उसके वोट प्रतिशत में 2.68 का इजाफा हुआ। लेकिन वह 36 सीटों के मुकाबले 21 सीटों पर सिमट गई। इस चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा 34 सीट लेकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
2012 में पुन: सरकार बनाई, दिए दो-दो मुख्यमंत्री
2012 के विधानसभा चुनाव में भी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा 31 सीटों पर सिमट गई तो कांग्रेस 32 सीटें लेकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। शुरुआत में विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने, लेकिन वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के बाद राज्य में सत्ता की बागडोर हरीश रावत को मिल गई। अंतर्कलह से जूझ रही पार्टी में वर्ष 2016 में नौ विधायकों ने बगावत कर दी और वह भाजपा में शामिल हो गए। रावत ने किसी तरह से कोर्ट की शरण लेकर सरकार बचाई।