विधानसभा चुनाव में सीट बदल कर जीतने वालों में डॉ. हरक सिंह अकेले भाग्यशाली नेता नहीं हैं। कुछ और भी विधायक हैं जिन्हें विधानसभा सीटों के आरक्षित होने या परिसीमन से उनका सामाजिक, जनसांख्यिक और क्षेत्रीय स्वरूप बदलने की वजह से पारंपरिक प्रत्याशी को दूसरे विधानसभा के लिए पलायन करना पड़ा। इनमें पूर्व कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य का नाम प्रमुख है। यशपाल आर्य खटीमा, मुक्तेश्वर, बाजपुर से विधायक रह चुके हैं। यूपी के समय वह खटीमा से विधायक रहे। राज्य गठन के बाद 2002 के विस चुनाव में वह मुक्तेश्वर विस से विधायक बने।
परिसीमन में मुक्तेश्वर सीट खत्म हो गई तो आर्य को बाजपुर सीट पर पलायन करना पड़ा। 2007 के विस चुनाव में सहसपुर सीट से भाजपा के राजकुमार जीते और 2017 के चुनाव में राजकुमार पुरोला सीट पर पलायन कर गए और चुनाव जीत गए। पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह पंवार 2002 में यमुनोत्री विस सीट चुनाव जीते। 2017 के विस चुनाव में प्रीतम पंवार ने यमुनोत्री सीट को बाय-बाय किया और धनोल्टी विस सीट से ताल ठोकी। उनका यह दांव सटीक बैठा। धनोल्टी सीट के सामान्य हो जाने के बाद वहां से विधायक खजानदास ने आरक्षित हुई राजपुर सीट से चुनाव लड़ा और जीत गए। विधायक गणेश जोशी को राजपुर सीट आरक्षित होने के कारण मसूरी विधानसभा का रुख करना पड़ा। जोशी को भी मसूरी विस रास आई। वह इस सीट पर लगातार दो बार विधायक चुने गए।
सीट बदलकर चुनाव लड़े तो ये दिग्गज हो गए जीरो
उत्तराखंड की चुनावी सियासत में सीट बदलकर चुनाव लड़ने वाले कुछ दिग्गज तो जीरो हो गए। पराजय के बाद उन्हें वापसी करने के लिए तगड़ी मशक्कत करनी पड़ी। इनमें सबसे पहला नाम पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी (रिटायर्ड) का है। 2007 में भाजपा की सरकार बनीं और सत्ता की बागडोर पार्टी ने जनरल खंडूड़ी के हाथों में सौंपी। खंडूड़ी के लिए कांग्रेस के जनरल टीपीएस रावत (रि.) ने अपनी धुमाकोट विस सीट छोड़ी। जनरल खंडूड़ी इस सीट से उपचुनाव जीतकर विस पहुंचे। 2012 में जब पार्टी ने उन्हें चेहरा बनाया तो जनरल ने चुनाव के लिए कोटद्वार विस सीट को चुना और वह हार गए। इस पराजय के बाद जनरल खंडूड़ी मुख्यधारा की राजनीति में वापसी नहीं कर सके। दिग्गज नेता हरीश रावत का भी यही हश्र हुआ।
2016 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने धारचूला विस से उपचुनाव जीता। 2017 के विस चुनाव में यह उनके लिए आसान सीट हो सकती थी। लेकिन उन्होंने हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा विस सीटों से चुनाव लड़ा और पराजित हो गए। मुख्यमंत्री रहते हुए दो-दो विधानसभा सीटों से चुनाव हारने का उन्होंने रिकॉर्ड बना दिया। डोईवाला विस से लगातार दो चुनाव जीतने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 2012 का चुनाव रायपुर विस सीट से लड़ा और पराजित हो गए। 2017 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय अपनी पारंपरिक सीट टिहरी को छोड़कर सहसपुर से चुनाव लड़ना भारी पड़ा और उन्हें मात खानी पड़ी। यूपी के समय कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट देहरादून सीट से 1985 में विधायक रहे। 2002 और 2007 का चुनाव बिष्ट राजपुर विधानसभा सीट से लड़ा और पराजित हुए और 2012 के चुनाव में डोईवाला सीट से हारे।