सियासी जानकारों का मानना है कि ऐसा करके सियासी दल और उनके नेता चुनाव में वोटों को ध्रुवीकृत करने का प्रयास करते हैं। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, चुनाव में धर्म और जाति की राजनीति हावी हो रही है। सियासी दलों पर क्षेत्रवाद और जातिवाद की सियासत का इस कदर दबाव है कि उन्हें अपना नेतृत्व चुनते समय भी इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि कुमाऊं से यदि मुख्यमंत्री हैं या गढ़वाल से प्रदेश अध्यक्ष होना चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष यदि क्षत्रीय या जनजातीय वर्ग से हैं तो प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण होना चाहिए। भाजपा और कांग्रेस इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। टिकट बंटवारे तक में राजनीतिक दलों का यह जातिवादी सियासत का चेहरा दिखाई दिया। भाजपा ने पौड़ी जिले में जब एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया तो कोटद्वार से उसे ब्राह्मण चेहरे विधायक रितु खंडूड़ी को मैदान में उतारना पड़ा। जबकि प्रत्याशियों की पहली सूची विधायक रितु खंडूड़ी का टिकट काट दिया गया था।
कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों में कई काबिल दावेदार इसलिए टिकट की दौड़ में बाहर हो गए क्योंकि वे वोटों के जातीय समीकरण में फिट नहीं बैठ रहे थे। सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल कहते हैं, सियासत के पीपीपी मॉडल के आगे चुनावी मुद्दे नेपथ्य में चले गए हैं।
एक-दूसरे के खिलाफ प्रोपेगेंडा, वोटों के पोलराइजेशन के लिए धार्मिक और जाति आधारित मुद्दों को हवा दी जा रही है और इससे भी बड़ी बात की सस्ती लोकप्रियता के लिए जनता से ऐसे वादों का बहु प्रचार (पोपुलाइजेशन) किया जा रहा है, जिसे मतदाता को भ्रमित करने की कोशिश की तौर पर देखा जाना चाहिए।
घोषणापत्रों से क्यों नहीं होती प्रचार की शुरुआत
एसडीएफ के संस्थापक अनूप नौटियाल प्रश्न उठाते हैं कि चुनाव प्रचार के आगाज के समय ही राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र लेकर क्यों नहीं आते। मतदाताओं को इतना वक्त मिलना चाहिए कि वे घोषणापत्रों में किए गए वादों की परख कर सके। ऐसी गंभीरता सियासी दलों की ओर से नहीं दिखाई दे रही है।