दृश्य देख विचलित हुए, उनको भी उबरने में समय
उत्तरकाशी के एसीएमओ डॉ. कुलवीर राणा धराली आपदा के दौरान नोडल अफसर रहे हैं, उन्होंने बताया कि धराली में आपदा पीड़ितों की पहले मनोदशा ज्यादा खराब थी, लेकिन टीम ने पहुंचकर जब उनकी काउंसलिंग की तो अब काफी ठीक हो गई है। टीम के सदस्य भी वहां के दृश्य देख विचलित हुए, उनको भी उबरने में समय लगा। उन्होंने बताया कि आपदा से प्रभावित परिवारों में डर, चिंता और उदासी जैसे मनोभाव पाए जा रहे हैं, खासकर उन लोगों में जिन्होंने अपनों, अपने घर, संपत्ति और आजीविका को खो दिया है। घरों का मलबा, फसल की बरबादी और राहत शिविरों में ठहरे लोगों में असुरक्षा की भावना देखी गई। वे गहरे सदमे में हैं और उनमें उदासी का माहौल है।
घबराहट और चिड़चिड़ापन जैसे नकारात्मक प्रभाव
श्रीनगर के सीएमएस डॉ राकेश रावत ने बताया कि यहां आपदा पीड़ित 12 लोग आए थे और 9 रह गए बाकी रेफर हो गए। दो महिलाएं ऐसी हैं जिनकी मनोदशा ठीक नहीं है। वह बताते हैं कि आपदाएं लोगों के मनोभावों पर चिंता, दुख, घबराहट और चिड़चिड़ापन जैसे नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। जो अक्सर अवसाद और चिंता के रूप में सामने आते हैं। इसके अलावा, नींद और भूख में बदलाव, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और सामाजिक अलगाव भी देखने को मिलता है। लोग चिंतित, घबराए हुए हैं। उन्हें फिर आपदा का डर सता रहा है। अपनों व संपत्ति के नुकसान से जुड़ा गहरा दुख महसूस होने पर कुछ लोग ज्यादा चिड़चिड़े या गुस्सैल हो रहे हैं। देहरादून में बादल फटने से मालदेवता क्षेत्र में सबसे ज्यादा तबाही हुई।
चिंता होना स्वाभाविक है पर ना उम्मीद नहीं
आपदा के मंजर को देखने से बिगड़ी मनोदशा वाले 150 से ज्यादा लोग मालदेवता पीएचसी पहुंचे। पीएचसी के प्रभारी डॉ. एमए भट्ट ने बताया कि ऐसे लोग घटना की बार-बार यादें आने से बेचैनी महसूस कर रहे थे। ऐसे में उनके दिल की धड़कन तेज होना और अनिद्रा के लक्षण थे। चमोली के सीएमओ डॉ. अभिषेक गुप्ता ने बताया कि कुंतरी की शांति देवी की मनोदशा पर आपदा का काफी असर पड़ा है, उनकी काउंसलिंग चल रही है। वैसे थराली, चेपड़ों व देवाल तक टीम गई थी, लेकिन कम लोग में ही ऐसे लक्षण मिले। लोग दुखी तो हैं चिंता होना स्वाभाविक है पर ना उम्मीद नहीं हैं।
धराली आपदा 5 अगस्त को
केस 1- कई परिवारों के जीवन भर की पूंजी कुछ मिनटों में तबाह हो गई। ऐसी ही हालत धराली गांव के भूपेंद्र पंवार की है। आपदा में उनका घर, सेब का बगीचा और एक वर्ष पूर्व बनाया गया होटल जमींदोज हो गया। जिससे हृदय रोग से पीड़ित भूपेंद्र पंवार की तबीयत और बिगड़ गई। उन्हें देहरादून रेफर करना पड़ा। वह पहले से ही उत्तरकाशी में इलाज की वजह से रह रहे थे। जिससे परिवार की जान बच गई।
17 सितंबर की रात
केस 2- कर्णप्रयाग के सेरा गांव के महिपाल सिंह गुसाईं के लिए विपदा लेकर आई। आसमान से आई आपदा में उनका घर व गोशाला बह गए। इसके साथ बह गए बेटी नीमा की शादी धूमधाम से करने के सपने। विवाह 23 सितंबर को होना था, जिसका इंतजाम करने महिपाल सिंह बाहर गए हुए थे। घर में पत्नी, बेटी व अन्य परिजन थे। शोर मचने पर वह जान बचाकर भागे। इस बीच सैलाब में पूरा घर शादी के सामान के साथ बह गया। यह देख उनकी पत्नी को सदमा लगा और वह सुध-बुध खो बैठी। हालांकि प्रशासन, रिश्तेदारों और मित्रों के सहयोग से विवाह हो ही गया।
थराली में 22 अगस्त की
केस 3- रात को आए सैलाब ने जमकर कहर बरपाया। चेपड़ों गदेरे के उफान ने चेपड़ों बाजार को मलबे के ढेर में बदल दिया। भरत सिंह ने बताया कि मलबे में कंप्यूटर सहित सभी सामान दब गया। चेपड़ों में ही हार्डवेयर का कारोबार करने वाले दर्शन डेढ़ दशक से यहां कारोबार करते हैं। उनके बच्चे बाहर पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई के लिए भी पैसा कहां से आएगा यह सवाल बना है।
आपदा के जख्म
थराली के राड़ीगांव के जगदीश पंत ने बताया कि उनके दो मकान अब रहने लायक नहीं हैं। उनकी मां गोविंदी देवी का स्वास्थ्य और बिगड़ गया है। उनका अपना वजन भी 62 से 56 किलो हो गया है। वहीं पुष्पा देवी का शुगर और बीपी भी बढ़ा हुआ है। गांव के दिनेश पंत, महेश चंदोला आदि लोग भी इसी मानसिक स्थिति से गुजर रहे हैं। आपदा के बाद से बीपी और शुगर के मरीजों की संख्या बढ़ी है जो कि तनाव और चिंता का परिणाम हो सकते हैं।
घर, खेत, बाग, डेयरी और होम स्टे... सब बह गए
उत्तरकाशी के उमेश पंवार कहते हैं कि 5 अगस्त को खीरगंगा की आपदा में पैतृक संपत्ति, घर, खेत, बाग, डेयरी, होम स्टे बह गए। सरकार से 5-7 लाख मिले, फिलहाल रिश्तेदारी में रह रहे हैं। अब बच्चों की पढ़ाई की चिंता है। सरकार हट बनवा दे तो घर में रहे। ग्राम प्रधान अजय नेगी को भी आपदा ने गहरे जख्म दिए हैं। उनका 34 साल का भाई सुमित नेगी और मित्र शुभम खीरगंगा के बहाव में बह गए। अपनों के चेहरे भुलाए नहीं भूलते। बहरहाल वह जख्मों को अनदेखा कर खुद और अन्य लोगों के विस्थापन की व्यवस्था करने में जुटे हैं।
इस तबाही ने डुंडा ब्लॉक के मालना गांव निवासी आईटीबीपी से रिटायर्ड उप निरीक्षक मनोज भंडारी की दुनिया ही उजाड़ दी। उन्होंने धराली में कल्प केदार मंदिर के नीचे सेब के बागानों के बीच जमीन लीज पर लेकर 14 कमरों का रिसॉर्ट बनाया। जो मलबे में तब्दील हो गया है। धराली गांव में मुकेश पंवार उनकी पत्नी विजेता और चार वर्षीय बेटा अनिक इस सैलाब में लापता हो गए। उनका छह वर्षीय बड़ा बेटा अक्षित पंवार उनकी राह देख रहा है। स्कूल चलने की वजह से अक्षित आपदा के दिन मामा के घर उत्तरकाशी में होने से बच गया।
लोन पर लिए थे वाहन, मलबे में हुए क्षतिग्रस्त
थराली, राड़ीबगड़ और चेपड़ों गांवों में हुई भारी बारिश से दुकानें, घर तो क्षतिग्रस्त हुए ही। लोन से लिए गए वाहन भी मलबे में दबने या बहने से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। चेपड़ों निवासी लक्ष्मी प्रसाद जोशी की टैक्सी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है। थराली के लक्ष्मी प्रसाद पुरोहित की टैक्सी भी टूट गई, यही हाल राधाबल्लभ जोशी, सूरज सिंह, देवेंद्र सिंह, नरेंद्र सिंह, राकेश राम सहित कई अन्य वाहन मालिकों का है।
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बचाव : मन की बात परिवार और दोस्तों से साझा करें
श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. मोहित सैनी सलाह देते हैं कि ऐसे लोगों को तत्काल मनोवैज्ञानिक परामर्श की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि लोग अपने मन की बात परिवार और दोस्तों से साझा करें, योग और सामूहिक प्रार्थना जैसी गतिविधियों में हिस्सा लें और अकेलेपन से बचें। मनोसामाजिक परामर्श केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि लोगों को भावनात्मक सहारा मिल सके। दोस्तों, परिवार और समुदाय का समर्थन उबरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।