यह संयोग ही कहें कि रविवार को इस साल केदारघाटी और बदरीनाथ क्षेत्रों में आई आपदा के छह माह पूरे हुए, इसी दिन राजधानी देहरादून में रविवार को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी आपदा से निपटने में उत्तराखंड सरकार की काहिली को जमकर कोसा।
अमर उजाला ने आपदा पीड़ित इलाकों में छह माह का हाल जाना तो पाया कि अभी भी पीड़ितों के जख्म हरे हैं। सर्दी अब नए सितमगर के रूप में सामने आई है, इस दौरान अगर कोई चीज बढ़ी है तो लोगों की मुसीबतें।
किराए के भवनों पर दिन गुजार रहे ग्रामीण
16/17 जून की जलप्रलय के छह माह के बाद भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जिंदगी पटरी पर लौटने के बजाय और उतरी नजर आती है। घाट, दशोली और जोशीमठ क्षेत्रों में छह माह बाद भी सड़क व पैदल रास्ते नहीं खुल पाए हैं। ग्रामीण मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं।
आपदा से बदहाल सड़कें और पैदल रास्ते बदहाल हैं। प्रभावित गांवों के पुनर्वास और विस्थापन के दावे भी हवाई साबित हुए हैं। आपदा में पिंडर के कहर से नारायणबगड़ का पुराना बाजार तबाह हो गया था। यहां अब भी जीवन डर के साए में है। सरकारी मदद के वितरण में भी सवाल उठ रहे हैं।
सड़क व पैदल मार्ग अब भी बदहाल
पिंडरघाटी की लाइफ लाइन कर्णप्रयाग-ग्वालदम मोटर मार्ग चलने लायक नहीं है। सिमली से लेकर थराली तक दस से अधिक स्थानों पर अब भी मलबा और बोल्डर अटके पड़े हैं। कालजाबर, हरमनी, बुसेड़ी पुल में स्थिति बदहाल है।
लोनिवि थराली-देवाल मार्ग का नौ सौ मीटर हिस्सा नहीं सुधार पाया है। देवाल के लिए बड़े वाहन अभी भी नहीं चल रहे हैं। नारायणबगड़-कौब, थराली-पार्था, देवाल-लोहाजंग मार्गो की हालत दयनीय है। प्रभावित क्षेत्रों में गांवों को जोड़ने वाले 20 से अधिक पैदल मार्गों की भी मरम्मत नहीं हो पाई है।
टूटे घरों, टैंट व शिविरों में कट रहा जीवन
आपदा प्रभावित गांव सुनाली, जैंटी, त्यूंला, भ्याड़ी, छपाली, केवर तल्ला, बेडगांव, थराली अपर बाजार क्षेत्र में जीवन पटरी पर नहीं लौटा है। जैंटी के सात प्रभावित परिवार तीन माह तक टैंट में रहने के बाद ठंड बढ़ने से दीपावली में अपने टूटे घरों में ही शरण लिए हुए हैं।
बेडगांव और त्यूंला के प्रभावित टैंट में रह रहे हैं। भ्याड़ी के दो परिवार पंचायत भवन पर तो केवर तल्ला के पांच परिवार जीआईसी नारायणबगड़ में जिंदगी गुजार रहे हैं। त्यूंला गांव के 11 परिवारों को मुआवजे के नाम पर एक भी रुपया नहीं मिला है।
नहीं हुआ गांवों का विस्थापन
जोशीमठ व थराली तहसील के 12 गांव विस्थापन की सूची में शामिल किए गए थे, जबकि 72 गांव पूर्व में विस्थापन की राह ताक रहे हैं। एक, दो गांवों को छोड़कर अभी तक अन्य किसी गांव का भौगोलिक सर्वे भी नहीं हो पाया है।
न शिविर लगे न प्रमाण पत्र बने
आपदा में तबाह हुए कागजातों के लिए शिविर भी नहीं लग पाए। इसमें कई लोगों के शैक्षिक प्रमाण पत्रों के साथ घरों में रखे राशन कार्ड, बैंक पास बुक, चेक बुक, खाता, खतौनी व नौकरी के दस्तावेज भी खो गए थे। जुलाई माह में सीएम ने स्वयं गुप्तकाशी पहुंचकर तहसीलों में शिविर लगाकर प्रभावितों के खोए प्रमाण पत्रों व दस्तावेजों को बनाने के निर्देश दिए थे। लेकिन छह माह बाद कहीं इस तरह के शिविर नहीं लगे हैं।
क्षतिग्रस्त संपत्तियों के पुनर्निर्माण व मरम्मत के लिए अब सरकार व वर्ल्ड बैंक से पैकेज मिलने शुरू हो गए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में जरूरी सुविधाओं की बहाली को लेकर विभागीय कार्यो की समीक्षा की जाएगी। क्षतिग्रस्त राजमार्ग व संपर्क मार्गो व पैदल रास्तों पूरी तरह से ठीक करने में कुछ समय लग सकता है।
--एसए मुरुगेशन जिलाधिकारी चमोली (गोपेश्वर)
रोजगार और पुनर्वास का इंतजार
प्रभावित क्षेत्रों में क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। हालांकि सरकार ने व्यवस्थाएं सुचारु करने के लिए धनराशि जिला प्रशासन को उपलब्ध करा दी है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में अभी तक बिजली, पानी, स्वास्थ्य, सड़क समेत मूलभूत सुविधाएं कामचलाऊ स्थिति में संचालित हो रही है।
जिस कारण आपदा प्रभावित आक्रोशित हैं। आपदा के कारण जिले में सबसे बड़ी समस्या रोजगार व पुनर्वास की बनी हुई है। जिसका अभी तक सरकार द्वारा कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है।
सरकार नहीं, वक्त लगा रहा मरहम
सरका, शासन-प्रशासन नहीं, वक्त ही पीड़ितों के लिए मरहम हो गया, तभी तो छह माह पहले इसी तारीख को उत्तरकाशी में जहां आपदा के चलते अफरा-तफरी मची थी, वहां अब सब कुछ सामान्य सा नजर आ रहा है। जबकि आधा साल गुजरने के बाद भी न तो तटवर्ती आबादी के लिए खतरा बना नदियों में जमा मलबा हटाने का काम शुरू हुआ है और न ही तटबंधों का निर्माण। अगस्त 2012 की बाढ़ के बाद भी इसी तरह की लापरवाही जून 2013 की बाढ़ में बड़ी तबाही का कारण बनी, लेकिन सरकारी तंत्र इससे सबक लेता नहीं दिख रहा है।
कई लोगों को मुआवजा तक नहीं मिला
आपदा के छह माह बीतने के बाद यदि सरकार की उपलब्धियां देखें तो जिले के सभी आपदा पीड़ितों को शतप्रतिशत मुआवजा राशि बांटने के दावे किए जा रहे हैं। जबकि अब भी बड़ी संख्या में पीड़ित मानकों एवं सीएम की घोषणा के अनुसार मुआवजा न मिलने पर दर-दर भटक रहे हैं। पिलंग गांव के ही 31 परिवारों के घर बाढ़ में बहे, पर इन परिवारों को 2-2 लाख रुपये मुआवजा तो दूर अहेतुक सहायता तक नहीं मिली।
उम्र के आखिरी मोड़ पर जाएं तो कहां जाएं
साल भर पहले हादसे में अपना बेटा और पोता गंवाने वाले त्यूंला गांव के नारायण सिंह व उनकी पत्नी महेशी देवी जिंदगी के आखिरी पायदान पर हैं लेकिन उनके सामने जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने की चुनौती है। आपदा ने घर की नींव हिला दी है।
फर्श से लेकर छत तक दरारें पड़ी हैं और पिछला हिस्सा बाहर की ओर धंसा है। सामान तंबू में है। आर्थिक स्थिति इतनी विकट है कि खेती-मजूरी से चूल्हा जलता है। ऐसे में दंपति को कुछ सूझ नहीं रहा है। डबडबाई आंखों से नारायण बताते हैं घर में विधवा बहू और दो पोतियां हैं। असुरक्षित घर छोड़कर कहां जाएं समझ में नहीं आ रहा।
समस्याएं कम नहीं हुईं
जून माह की आपदा में शहर के शक्तिविहार और एसएसबी का क्षेत्र जलमग्न हो गया था। आपदा के 6 माह पूरे हो जाने के बावजूद भी प्रभावित क्षेत्र में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। प्रभावित क्षेत्र में नालियां अभी तक क्षतिग्रस्त हैं जिससे के घरों का सारा गंदा पानी सड़कों में बह रहा है। साथ ही संपर्क मार्गों पर मलबे के ढेर लगे हुए हैं।